आसमान से गायब होते कौवे- प्रकृति के रक्षक पर मंडराता अस्तित्व का संकट
छत्तीसगढ़ – कभी सुबह की पहली किरण के साथ कांव-कांव करते कौवे शहर और गांव की पहचान हुआ करते थे। आज कई इलाकों में उनकी संख्या कम दिखाई देना चिंता का विषय है। पितरों को भोजन कराने की परंपरा में कौवे की प्रतीक्षा करने वाले लोगों को भी कई बार कौवे आसानी से नहीं मिलते। सवाल है—क्या प्रकृति का यह उपयोगी प्रहरी आधुनिक जीवनशैली की कीमत चुका रहा है?
कौवे प्रकृति के महत्वपूर्ण सफाईकर्मी हैं। वे मृत जीव-जंतुओं, जैविक कचरे और बचे हुए भोजन को खाकर पर्यावरण में गंदगी और संक्रमण फैलने की संभावनाओं को कम करने में योगदान देते हैं। बीजों के प्रसार और खाद्य-श्रृंखला को संतुलित रखने में भी उनकी भूमिका मानी जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार शहरीकरण, पेड़ों की कटाई, खुले स्थानों में कमी और कचरे के बदलते स्वरूप ने कौवों के प्राकृतिक भोजन और आवास को प्रभावित किया है। वायु तथा ध्वनि प्रदूषण, रसायनों का बढ़ता उपयोग और बदलती जलवायु भी पक्षियों के लिए चुनौती बन सकते हैं। मोबाइल टावर, आधुनिक संचार तकनीक और अन्य वैज्ञानिक उपकरणों को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं, लेकिन कौवों की संख्या में कमी का कारण किसी एक तकनीक को मान लेना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।

मानव की विकास यात्रा ने सुविधाएं बढ़ाई हैं, लेकिन प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। पेड़ बचाना, जैविक कचरे का उचित प्रबंधन करना और पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास तथा जल की व्यवस्था करना कौवों समेत पूरे शहरी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा में मदद कर सकता है।
कौवा केवल कांव-कांव करने वाला पक्षी नहीं, बल्कि प्रकृति का मौन सफाईकर्मी और पर्यावरण का महत्वपूर्ण प्रहरी है। उसके घटते स्वर हमें चेतावनी देते हैं कि विकास के साथ प्रकृति की आवाज भी सुनना जरूरी है।






