हाईवे से गली-मोहल्ले तक निराश्रित मवेशियों का जमावड़ा

परेशानी के साथ मौत का कारण भी बन रहे मवेशी, तीन माह में सड़क हादसों ने बढ़ाई चिंता

कोरिया में 13 गोधाम के लिए पंचायतों से एनओसी, राज्य गौ सेवक आयोग की अनुमति का इंतजार
छत्तीसगढ़ –
छत्तीसगढ़ में हाईवे से लेकर शहरों की गलियों और मोहल्लों तक निराश्रित मवेशियों का जमावड़ा लोगों के लिए परेशानी के साथ अब जानलेवा भी साबित हो रहा है। सड़कों पर बैठे या विचरण करते मवेशियों के कारण वाहन चालकों को दुर्घटना का खतरा बना रहता है। बीते तीन महीनों में सड़कों पर मवेशियों के साथ ही इंसानों की मौत के मामलों में बढ़ोतरी ने शासन-प्रशासन की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े किए हैं। आरोप है कि निराश्रित पशुओं की व्यवस्था को लेकर जारी नियम और निर्देश जमीनी स्तर पर प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो पा रहे हैं।

सड़कों पर मवेशियों के जमावड़े की समस्या केवल राजधानी या बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों से गुजरने वाले हाईवे और प्रमुख मार्गों पर भी बड़ी संख्या में निराश्रित पशु नजर आते हैं। रात के समय इन मवेशियों के कारण दुर्घटना का खतरा और बढ़ जाता है। कई बार तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आने से पशुओं की मौत हो जाती है, वहीं वाहन सवार भी गंभीर हादसों का शिकार होते हैं।

कोरिया ने बढ़ाया कदम-

निराश्रित पशुओं के भविष्य और देखभाल को लेकर कोरिया जिले में पहल तेज हुई है। जिले में 13 गोधाम के संचालन के लिए संबंधित पंचायतों से एनओसी प्राप्त होने की जानकारी है। अब इन गोधामों के संचालन के लिए राज्य गौ सेवक आयोग की अनुमति का इंतजार है। अनुमति मिलने के बाद इन्हें व्यवस्थित तरीके से संचालित करने की दिशा में आगे की कार्रवाई की जाएगी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार शासन के प्रावधानों के अनुसार संचालन के लिए एनओसी प्राप्त समिति को आर्थिक अनुदान दिए जाने की व्यवस्था है। 200 मवेशियों की देखभाल के लिए शासन स्तर से करीब 19.54 लाख रुपये का अनुदान दिए जाने का प्रावधान बताया जा रहा है। गोधाम के संचालन में चरवाहे के साथ कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता की नियुक्ति को भी अनिवार्य किया गया है। इससे पशुओं की नियमित देखभाल, चारा-पानी और प्रजनन संबंधी व्यवस्थाओं को व्यवस्थित करने का उद्देश्य है।

कोरिया की इस पहल के बाद सवाल यह है कि क्या प्रदेश के अन्य जिले भी निराश्रित मवेशियों की समस्या के स्थायी समाधान के लिए इसी तरह ठोस कदम उठाएंगे। सड़कों पर पशुओं का जमावड़ा रोकने के लिए केवल अभियान या अस्थायी व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि उनके संरक्षण और देखभाल के लिए स्थायी ढांचा जरूरी है।

नियमों और शासन के निर्देशों के बावजूद यदि निराश्रित पशु सड़कों पर ही नजर आते रहे तो दुर्घटनाओं का सिलसिला थमना मुश्किल होगा। ऐसे में देखना होगा कि कोरिया की पहल प्रदेश के अन्य जिलों के लिए उदाहरण बनती है या फिर निराश्रित पशुओं से जुड़े नियम और निर्देश फाइलों में ही दबे रह जाते हैं। कहा जा सकता है कि व्यवस्था प्रभावी नहीं हुई तो सड़कों पर पशुओं के साथ मानव जीवन की सुरक्षा भी छत्तीसगढ़ मे लगातार खतरे में बनी रहेगी।

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