मानसून की बेरुखी से बढ़ी चिंता- अल नीनो ने बिगाड़ा देश मे खेती का गणित

नई दिल्ली- वर्ष 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून देश की खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। अब तक देश में सामान्य से करीब 15 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। जून की बेहद कमजोर शुरुआत, उसके बाद जुलाई-अगस्त में कुछ सुधार और फिर कई इलाकों में लंबे शुष्क दौर ने बारिश की कमी को गंभीर स्तर पर बनाए रखा। मौसम विभाग के मुताबिक 19 सितंबर के आसपास पश्चिमी राजस्थान से मानसून की वापसी शुरू होने की परिस्थितियां बन गई हैं।

हालांकि मानसून का अंतिम आकलन 30 सितंबर के बाद ही होगा, मौजूदा आंकड़े कृषि क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं। दक्षिण प्रायद्वीप में बारिश की कमी करीब 28 प्रतिशत, जबकि पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में करीब 25 प्रतिशत रही। पंजाब, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना जैसे कृषि प्रधान राज्यों के कई हिस्से भी बारिश की कमी से जूझ रहे हैं।

कृषि विशेषज्ञ कहते है कि इसका सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ सकता है। जून के अंत तक कमजोर बारिश के कारण खरीफ बुवाई का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में करीब 21 प्रतिशत पीछे था। बाद में बारिश सुधरने से स्थिति संभली, लेकिन अब भी कुल खरीफ रकबा अब भी पिछले साल से लगभग 1.45 प्रतिशत कम था। धान, दालों, सोयाबीन और कपास जैसी फसलों पर दबाव विशेष चिंता का विषय है।

अल नीनो ने बढ़ाई मुश्किल-

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार मजबूत होता अल नीनो इस मानसून की कमजोर बारिश के प्रमुख जलवायु कारकों में रहा है। अल नीनो भारतीय मानसून की नमी और वर्षा गतिविधि को कमजोर कर सकता है, हालांकि इसका असर हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता। इस बार कम बारिश का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है—जलाशयों में पानी का स्तर भी पिछले साल और दीर्घकालिक औसत से नीचे है।

बताया जा रहा है कि धान उत्पादन में गिरावट के शुरुआती अनुमान भी सामने आने लगे हैं। सामने आ रही जानकारियों के अनुसार 2026 में भारत का चावल उत्पादन करीब 10 मिलियन टन घटने का अनुमान है। हालांकि सरकारी भंडार पर्याप्त होने से तत्काल खाद्य सुरक्षा पर दबाव को कुछ हद तक संभालने की क्षमता बनी हुई है।

पता हो भारत की बड़ी आबादी की आजीविका सीधे या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। इसलिए कमजोर मानसून का असर किसान की आय से लेकर खाद्य कीमतों, ग्रामीण मांग और अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है। खरीफ उत्पादन में कमी और मिट्टी में घटती नमी का असर आगे रबी की बुवाई पर भी पड़ सकता है। सरकार ने भी आगामी रबी सीजन के लिए बीज, उर्वरक और जल प्रबंधन को लेकर तैयारियां तेज की हैं।

फिलहाल इस संबंध मे तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं बताई जाती है। सितंबर की शेष बारिश कुछ क्षेत्रों में नुकसान को कम कर सकती है, लेकिन मानसून की विदाई शुरू होने के साथ यह स्पष्ट है कि 2026 की बारिश ने भारतीय कृषि के सामने पानी, उत्पादन और आय—तीनों मोर्चों पर नई चुनौती खड़ी कर दी हैl

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