पाकिस्तान में पेट्रोल संकट की नई चेतावनी: ₹1,000 लीटर तक पहुंच सकता है ईंधन, आर्थिक संकट के बीच बढ़ता जनाक्रोश

नई दिल्ली – पाकिस्तान की आर्थिक मुश्किलें अब सीधे आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डाल रही हैं। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने चेतावनी दी है कि यदि देश में ईंधन की वास्तविक कमी पैदा हुई तो पेट्रोल की कीमत 1,000 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती है। उनके अनुसार पाकिस्तान में पेट्रोलियम कीमतों में पहले ही करीब 50 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है।

तेल की कीमत नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था दबाव में-

पाकिस्तान के इस संकट की तत्काल वजह केवल पाकिस्तान सरकार की नीतियां नहीं हैं। मध्य-पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव और तेल आपूर्ति मार्गों में व्यवधान ने पाकिस्तान जैसे ऊर्जा-आयात पर निर्भर देश को विशेष रूप से प्रभावित किया है। IMF के अनुसार पाकिस्तान के ईंधन आयात का लगभग 81 प्रतिशत खाड़ी क्षेत्र से आता है, जिससे क्षेत्रीय संघर्ष का असर सीधे पेट्रोल, बिजली, परिवहन और महंगाई पर पड़ता है।

लेकिन संकट की जड़ें इससे कहीं गहरी हैं। पाकिस्तान लंबे समय से ऊंचे सार्वजनिक ऋण, सीमित विदेशी मुद्रा भंडार, कमजोर ऊर्जा क्षेत्र और आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था से जूझ रहा है। IMF कार्यक्रम के तहत उसे राजकोषीय अनुशासन और ऊर्जा कीमतों में सुधार जैसे कठिन कदम उठाने पड़े हैं।

सरकारी कटौती से सड़क तक बढ़ता असंतोष-

ईंधन महंगा होने के बाद सरकार ने सरकारी वाहनों के ईंधन आवंटन में कटौती, नए सरकारी वाहनों की खरीद पर रोक और सरकारी विदेश यात्राओं पर प्रतिबंध जैसे मितव्ययिता उपाय लागू किए हैं। बाजारों और कारोबार के समय को सीमित करने जैसे फैसले भी लिए गए हैं।

इन परिस्थितियों में जनता के लिए पेट्रोल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि महंगाई की पूरी श्रृंखला का आधार बन गया है। ईंधन महंगा होता है तो परिवहन, खाद्य पदार्थ और उत्पादन लागत भी बढ़ती है। हालिया विरोध प्रदर्शनों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा पेट्रोल की कीमतों के खिलाफ प्रतीकात्मक रूप से गधे की गाड़ियों का इस्तेमाल किया जाना जनता की नाराजगी का संकेत रहा है।

पाकिस्तान की विदेश नीति भी इस आर्थिक कमजोरी से अलग नहीं देखी जा सकती। खाड़ी देशों से ऊर्जा और वित्तीय निर्भरता तथा IMF और बाहरी वित्तपोषण पर भरोसा इस्लामाबाद की आर्थिक नीति के विकल्प सीमित करता है। मौजूदा संकट इसलिए केवल पेट्रोल की कीमत का संकट नहीं, बल्कि वर्षों से जमा आर्थिक असंतुलन और बाहरी ऊर्जा निर्भरता की परीक्षा कहा जा रहा है।

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