हाथी के पैरों तले जिंदगी- मुआवजे के मरहम से कब तक चलेगा खेल?
सरगुजा में दो मौतों ने फिर खोली- वन विभाग की तैयारी की पोल- मानव-हाथी संघर्ष रोकने की ठोस योजना पर उठे सवाल
छत्तीसगढ़ –
छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में हाथी और इंसान के बीच बढ़ता संघर्ष अब सिर्फ वन्यजीव संरक्षण का मुद्दा नहीं, बल्कि ग्रामीणों की जिंदगी और सरकारी व्यवस्था की परीक्षा बन चुका है। सूरजपुर और बलरामपुर जिले में घूम रहे लोनर हाथियों ने 30 वर्षीय युवक और 53 वर्षीय ग्रामीण की जान ले ली। जिससे दो परिवारों की खुशियां उजड़ने से गांवों में दहशत फैल गई और एक बार फिर वही सवाल खड़ा हो गया—आखिर इन मौतों को रोकने के लिए वन विभाग की ठोस तैयारी कहां है?
मौत के बाद सक्रिय होता है सिस्टम, पहले क्यों नहीं?

हादसा होने के बाद छत्तीसगढ़ के वन विभाग के अधिकारी मृतकों के घर पहुंचते हैं। तात्कालिक सहायता के रूप में 25 हजार रुपये दिए जाने की प्रक्रिया शुरू होती है। लेकिन इसके बाद मिलने वाली शेष मुआवजा राशि कब मिलेगी, इसकी स्पष्ट और समयबद्ध जानकारी ग्रामीणों को अक्सर नहीं मिलती। सवाल यह है कि सरकारी तंत्र की सक्रियता मौत के बाद ही क्यों दिखाई देती है?
मुनादी से आगे कब बढ़ेगी व्यवस्था?
सरगुजा संभाग मे हर घटना के बाद ग्रामीणों को मुनादी कराकर सतर्क करने की बात सामने आती है। लेकिन क्या केवल चेतावनी से हाथियों के बदलते रास्ते, गांवों में उनकी आवाजाही और लगातार बढ़ते संघर्ष को रोका जा सकता है? ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए निगरानी तंत्र, हाथियों की वास्तविक समय में लोकेशन सूचना, संवेदनशील गांवों की विशेष सुरक्षा और त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था को लेकर सवाल लगातार बने हुए हैं।
मुआवजा जरूरी है, लेकिन जिंदगी की कीमत नहीं l
हादसों के बाद अब ग्रामीणों में यह भावना गहरी होती जा रही है कि व्यवस्था हादसे रोकने के बजाय हादसे के बाद मुआवजा देने तक सीमित होकर रह गई है। यदि विभागीय लापरवाही, संसाधनों की कमी या भ्रष्टाचार संबंधी आरोप हैं, तो उनकी स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। जिम्मेदारी तय किए बिना केवल आर्थिक सहायता देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
मानव-हाथी संघर्ष कब खत्म होगा?
सरगुजा में हाथी-मानव संघर्ष अब छिटपुट घटनाओं की श्रृंखला नहीं रह गया है। सरकार को तत्काल दीर्घकालिक कार्ययोजना, वैज्ञानिक निगरानी, प्रभावित गांवों की जोखिम-आधारित सुरक्षा और जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्था सामने रखनी होगी। वरना हर नई मौत के बाद मुआवजे का मरहम तो मिलता रहेगा, लेकिन ग्रामीणों के मन में यही सवाल जिंदा रहेगा—अगली बारी किसकी है और सरकार कब जागेगी?






