राजनीति किसी की सगी नहीं! छत्तीसगढ़ में गुरु-चेले के बीच सियासी शक्ति-परीक्षा- भूपेश की विरासत के बीच देवेंद्र के बढ़ते कदम
छत्तीसगढ़ – राजनीति में रिश्ते स्थायी नहीं होते, समीकरण स्थायी होते हैं। सत्ता की बिसात पर कभी गुरु-शिष्य साथ दिखाई देते हैं तो वक्त बदलने पर वही रिश्ते शक्ति-परीक्षण में बदल जाते हैं। छत्तीसगढ़ के नगरीय निकाय चुनाव में वर्तमान मे भिलाई, रिसाली और भिलाई-चरोदा नगर निगम इसी बदलते सियासी समीकरण की दिलचस्प तस्वीर पेश कर रहे हैं। यहां मुकाबला भले ही सीधे तौर पर भाजपा और कांग्रेस के बीच हो, लेकिन कांग्रेस के भीतर भी इन चुनावों को लेकर एक अलग राजनीतिक संदेश पढ़ा जा रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का भिलाई-दुर्ग क्षेत्र की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रहा है। वहीं युवा कांग्रेस नेता और भिलाई नगर से विधायक देवेंद्र यादव ने भी इसी राजनीतिक क्षेत्र से अपनी अलग पहचान बनाई है। यही वजह है कि इन तीन नगर निगमों के चुनाव को कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, प्रभाव और संगठनात्मक पकड़ की परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है।

सियासी चर्चा यह है कि जिन इलाकों में कभी भूपेश बघेल का प्रभाव निर्णायक माना जाता था, वहां देवेंद्र यादव अब अपनी राजनीतिक जमीन को और मजबूत करने की कोशिश में हैं। भिलाई, रिसाली और भिलाई-चरोदा में कांग्रेस की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन निकायों का परिणाम स्थानीय संगठन से लेकर भविष्य की क्षेत्रीय राजनीति तक कई संकेत दे सकता है।
एक तरफ भूपेश बघेल का लंबा राजनीतिक अनुभव, संगठन पर पकड़ और क्षेत्र में स्थापित प्रभाव है, तो दूसरी ओर देवेंद्र यादव के सामने युवा नेतृत्व के रूप में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत करने की चुनौती है। ऐसे में इन चुनावों की हर जीत-हार को केवल भाजपा-कांग्रेस के आंकड़ों से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर बदलते शक्ति-संतुलन के नजरिए से भी देखा जाएगा।
यानी नगरीय निकाय चुनाव की सियासी पटकथा में मैदान पर भाजपा बनाम कांग्रेस है, लेकिन परदे के पीछे सवाल यह भी है—क्या भूपेश के प्रभाव वाले मैदान में देवेंद्र यादव अपनी अलग राजनीतिक पारी का मजबूत अध्याय लिख पाएंगे?






