14 सितंबर का हिंदी दिवस- सरकारी दफ्तरों में राजभाषा सिर्फ खानापूर्ति क्यों?
14 सितंबर को हिंदी दिवस पर सरकारी कार्यालयों में कार्यक्रम हुए , भाषण हुए , हिंदी को बढ़ावा देने के संकल्प लिए गए । लेकिन सवाल यह है कि साल के बाकी 364 दिन हिंदी कहां होती है? राजभाषा को बढ़ाने और स्थापित करने का दावा करने वाली व्यवस्था की जमीनी हकीकत कई बार इसके उलट दिखाई देती है। केंद्र सरकार के मंत्रालयों से लेकर सार्वजनिक उपक्रमों तक पत्राचार और कार्यालयीन कामकाज में अंग्रेजी का दबदबा अब भी स्पष्ट नजर आता है।
रेलवे, कोल इंडिया सहित अनेक केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी कार्यालयों में अधिकारियों द्वारा अंग्रेजी में पत्राचार को प्राथमिकता दिए जाने की शिकायतें अक्सर सामने आती हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कई पत्रों में अधिकारी हिंदी में केवल हस्ताक्षर करते हैं, जबकि पूरा पत्र अंग्रेजी में तैयार होता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हिंदी सरकारी कार्यालयों में केवल कार्यक्रमों और समारोहों की भाषा बनकर रह गई है?

कहा जा सकता है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की अभिव्यक्ति, संवाद और आत्मसम्मान से जुड़ी है। आम नागरिक सरकारी कार्यालय में अपनी भाषा में सहज संवाद चाहता है। राजभाषा का उद्देश्य अंग्रेजी से टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि सरकारी कामकाज में हिंदी के संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना है।
इस सबंध मे लोगो का कहना है कि अब वक्त सिर्फ हिंदी सप्ताह, पखवाड़े और दिवस मनाने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। राजभाषा अधिनियम और निर्धारित नियमों की जानबूझकर अनदेखी करने वाले विभागों और जिम्मेदार अधिकारियों के लिए स्पष्ट जवाबदेही तथा प्रभावी दंडात्मक प्रावधान जरूरी हैं।

वहीं हिंदी को मंच पर सम्मान और फाइलों में उपेक्षा—यह दोहरा रवैया अब बदलना होगा। राजभाषा की प्रतिष्ठा भाषणों से नहीं, सरकारी कामकाज में उसके वास्तविक इस्तेमाल से तय करनी होगी।





