पीरुल लाओ, पैसे कमाओ- पहाड़ की घास बनी रोजगार की आस

उत्तराखंड – जिस पिरुल को जंगल की आग और तबाही का कारण माना जाता था, वही अब पहाड़ की महिलाओं के लिए आमदनी और आत्मनिर्भरता का जरिया बन रही है

उत्तराखंड के जंगलों में बिखरा पीरुल अब सिर्फ सूखी घास नहीं, बल्कि रोजगार की नई उम्मीद बनता दिखाई दे रहा है। कभी यही पीरुल गर्मियों में जंगलों की आग को भड़काने वाली बड़ी वजहों में गिना जाता था। अब इसके संग्रह और उपयोग को रोजगार से जोड़ने की पहल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक नई संभावना पैदा की है।

जंगल से संग्रह, घर तक रोजगार-

पहाड़ी क्षेत्रों की महिलाएं और ग्रामीण जंगलों से पीरुल एकत्र कर उसे संबंधित संस्थाओं और विभागों तक पहुंचाकर आय अर्जित कर सकते हैं। इससे एक ओर ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिलता है, वहीं दूसरी ओर जंगलों में पड़े सूखे पत्तों और घास के प्रबंधन में भी मदद मिल सकती है।

पीरुल का उपयोग ईंधन, सजावटी वस्तुओं, घरेलू उपयोग के सामान और विभिन्न उपयोगी उत्पादों में किया जा रहा है। यानी जिसे कल तक समस्या माना जाता था, वही आज संभावित आर्थिक संसाधन में बदल रहा है।

उत्तराखंड से दूसरे राज्यों को सीखने का अवसर-

सवाल यह भी है कि जब पहाड़ों और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रकृति स्वयं अनेक संसाधन उपलब्ध कराती है, तो दूसरे राज्य सरकारें भी ऐसी स्थानीय उपज को रोजगार से जोड़ने की योजनाएं बड़े पैमाने पर क्यों नहीं विकसित करतीं?

देश के अलग-अलग राज्यों में बांस, महुआ, लाख, औषधीय वनस्पतियां, वन उपज और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों को ग्रामीण रोजगार से जोड़ने की व्यापक संभावनाएं हैं।

पीरुल बने प्रेरणा, पहाड़ बने आत्मनिर्भर-

उत्तराखंड की पीरुल आधारित पहल केंद्र और अन्य राज्य सरकारों के लिए यह संदेश देती है कि स्थानीय संसाधन को स्थानीय लोगों के श्रम और कौशल से जोड़ दिया जाए तो रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं।

जरूरत केवल योजना बनाने की नहीं, बल्कि खरीद, उचित मूल्य, प्रशिक्षण, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच की मजबूत व्यवस्था करने की है। ऐसा हुआ तो पहाड़ की प्राकृतिक संपदा पहाड़ के लोगों की समृद्धि का आधार बन सकती है।

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