सूरजपुर में विकास के दावों पर भारी पड़ रही बदहाल सड़कें- ग्रामीणों की राह में प्रशासनिक उदासीनता बनी बाधा
विकास की असली तस्वीर सरकारी दफ्तरों की फाइलों में नहीं, बल्कि उन ग्रामीण रास्तों पर दिखाई देती है, जहां आज भी लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। सूरजपुर जिले के कई गांव में सड़क की मांग को लेकर ग्रामीणों का आंदोलन व हड़ताल करना और सुनवाई नहीं होने पर कई कई किलोमीटर पैदल चलकर जनपद कार्यालय पहुंचना व्यवस्था के प्रति गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों का यह संघर्ष महज सड़क निर्माण की मांग नहीं, बल्कि उनके सम्मान, सुरक्षित आवागमन और बेहतर भविष्य की लड़ाई है। जब किसी गांव के लोगों को अपनी जायज मांग प्रशासन तक पहुंचाने के लिए भूख हड़ताल और लंबी पदयात्रा का सहारा लेना पड़े, तो यह स्थानीय स्तर पर जनसमस्याओं की सुनवाई और समाधान की व्यवस्था पर आत्ममंथन का विषय है।

सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है, जब खराब सड़कों के कारण स्कूली बच्चों की शिक्षा, मरीजों की अस्पताल तक पहुंच और किसानों की उपज का परिवहन प्रभावित होने लगता है। ऐसे में विकास योजनाओं की प्राथमिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब जरूरत आश्वासनों की नहीं, जवाबदेही के साथ ठोस कार्रवाई की है। जिला प्रशासन को गांवों की सड़कों का सर्वे कर प्राथमिकता सूची तैयार करनी चाहिए। जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों को निर्माण कार्यों की समयसीमा सार्वजनिक करनी चाहिए। साथ ही, स्वीकृत कार्यों की नियमित गुणवत्ता जांच और शिकायतों के त्वरित निराकरण की व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए।
लोकतंत्र की सार्थकता तभी है, जब ग्रामीणों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए आंदोलन का रास्ता न चुनना पड़े। सूरजपुर के गाँवो से उठ रही सुविधाओं की आवाज को प्रशासन एक चेतावनी नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास की दिशा सुधारने का अवसर समझे। तो यह समस्या निदान की दिशा मे बेहतर माना जाये ऐसा लोगो का मानना है






