चार साल अधूरी सड़क पर नहीं जागा प्रशासन, ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर खुद बना दी राह
छत्तीसगढ़ – विकास के दावों के बीच सूरजपुर जिले के महावीर गांव की तस्वीर शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। गांव में करीब चार साल से अधूरी और जर्जर पड़ी सड़क के लिए ग्रामीणों ने पहले अधिकारियों के दरवाजे खटखटाए, लेकिन जब सुनवाई नहीं हुई तो आखिरकार ग्रामीणों ने आपस में चंदा जुटाया और सड़क की मरम्मत का काम खुद पूरा कर दिया।
ग्रामीणों के मुताबिक इस दौरान जिले में तीन कलेक्टर तक बदल गए, लेकिन सड़क की समस्या जस की तस बनी रही। गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली यह सड़क लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही का महत्वपूर्ण जरिया है। सड़क की बदहाली से ग्रामीणों को आवागमन में परेशानी के साथ बरसात और आपात स्थिति में अतिरिक्त दिक्कतों का सामना करना पड़ता रहा।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस काम की जिम्मेदारी संबंधित विभाग और स्थानीय प्रशासन की थी, उसके लिए ग्रामीणों को अपनी जेब से पैसा क्यों लगाना पड़ा? व्यवस्था तब क्यों नहीं जागी, जब ग्रामीण लगातार समस्या की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे थे?
सड़क का काम पूरा होने के बाद सरपंच की ओर से यह कहना कि “हम तो काम करने वाले थे”, अपने आप में व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। यदि काम होना ही था तो चार साल तक ग्रामीणों को परेशानी क्यों झेलनी पड़ी?
सूरजपुर जिले मे महावीर गांव की घटना केवल एक सड़क की कहानी नहीं है। सरगुजा संभाग के कई गांवों में मुख्य सड़क से गांव को जोड़ने वाली एक-दो किलोमीटर की सड़कें आज भी उपेक्षा का शिकार हैं। विभागीय उदासीनता और अधिकारियों की निगरानी के अभाव में छोटी सड़कें ग्रामीणों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती हैं। महावीरपुर के ग्रामीणों ने सड़क बनाकर सिर्फ रास्ता नहीं बनाया, बल्कि उस व्यवस्था के सामने सवाल खड़ा किया है, जो समय रहते उनकी समस्या का समाधान नहीं कर सकी।






