घी के नाम पर भरोसे का कारोबार! ‘100% शुद्ध’ के दावों की लैब में खुली पोल

छत्तीसगढ़ – जिस घी को परिवार की सेहत, बच्चों के पोषण और पूजा की पवित्रता से जोड़ा जाता है, उसी घी की जांच रिपोर्ट अब उपभोक्ताओं के भरोसे पर सवाल खड़े कर रही है। रायपुर में लिए गए 12 नमूनों में 6 निर्धारित मानकों पर फेल पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार अमूल, देवभोग, वचन, कीर्ति गोल्ड प्योर काऊ घी, देशी घी धौलपुर और वास्तु एगमार्क घी के नमूनों में तय सीमा से अधिक लेड मिला। कीर्ति गोल्ड में लेड 0.192 mg/kg तक पहुंचा, जबकि बताई गई सीमा 0.02 mg/kg थी। वास्तु के नमूने में लेड के साथ वनस्पति फैट की मौजूदगी और अन्य पैरामीटर में भी गड़बड़ी बताई गई है।

इसी प्रकार भोपाल की एक अन्य जांच में गोवर्धन प्योर काउ घी में 0.241 mg/kg और धौलपुर फ्रेश में 0.296 mg/kg लेड मिलने की रिपोर्ट सामने आई—यानी निर्धारित सीमा से क्रमशः करीब 12 और 14.8 गुना अधिक। द्वारकेश के नमूने में बीटा-सिटोस्टेरॉल मिला, जो वनस्पति तेल/वसा की मिलावट का संकेत माना जाता है।

कानून के जानकारो का इस संबंध मे कहते है कि यहां सवाल सिर्फ जुर्माने का नहीं, उपभोक्ता के भरोसे और स्वास्थ्य के अधिकार का है। ‘100% शुद्ध’, ‘प्योर काउ’ और ‘प्रीमियम’ जैसे शब्द अगर पैकेट पर चमकते हैं तो उनकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। विज्ञापन में शुद्धता का दावा और लैब रिपोर्ट में गड़बड़ी—यह विरोधाभास कंपनियों से जवाब मांगता है।

लोगो की राय में केवल जुर्माना पर्याप्त नहीं। संदिग्ध बैच की तत्काल बिक्री रोकना, बाजार से रिकॉल, स्वतंत्र पुनः जांच, जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करना, उपभोक्ताओं को क्षतिपूर्ति और गंभीर/दोहराए गए मामलों में लाइसेंस निलंबन या अभियोजन जैसी कार्रवाई होनी चाहिए। खाद्य सुरक्षा में ‘जुर्माना भरकर आगे बढ़ो’ वाली व्यवस्था भरोसा नहीं बचा सकती।

आखिर घी सिर्फ एक उत्पाद नहीं—लोग इसे अपने परिवार की सेहत में निवेश समझकर खरीदते हैं। इस भरोसे में मिलावट की कीमत सिर्फ कंपनी की बैलेंस शीट से नहीं चुकाई जानी चाहिए।

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