शरद पूर्णिमा की चांदनी में औषधीय खीर का प्रसाद, आस्था और आयुर्वेद का अनूठा संगम

चिरमिरी वेस्ट पोंडी में विशेष शिविर सफल, बड़ी संख्या में रोगियों ने देर रात तक पहुंचकर ग्रहण किया औषधीय खीर का प्रसाद; विशेषज्ञ चिकित्सकों के मार्गदर्शन में हुआ आयोजन
छत्तीसगढ़ -एमसीबी – शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी, श्रद्धा से भरा वातावरण और सेहत की उम्मीद लेकर पहुंचे लोगों की भीड़। आस्था, परंपरा और आयुर्वेद के संगम का ऐसा ही दृश्य चिरमिरी के वेस्ट चिरमिरी, पौड़ी इकाई स्थित शिव मंदिर के समीप आयोजित औषधीय खीर वितरण शिविर में देखने को मिला। शरद पूर्णिमा की पावन रात्रि में बड़ी संख्या में रोगियों और स्थानीय लोगों ने आयोजन में भाग लेकर औषधीय खीर का प्रसाद ग्रहण किया। शाम से शुरू हुआ लोगों के पहुंचने का सिलसिला देर रात तक जारी रहा और सामूहिक सहभागिता ने कार्यक्रम को भव्य एवं सफल बना दिया।

भारतीय धार्मिक परंपरा में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों से अमृत वर्षा होती है। इसी आस्था के चलते खीर को चांदनी में रखने और प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसी परंपरा से जुड़ी औषधीय खीर का आयोजन धार्मिक विश्वास के साथ पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान के प्रति लोगों की रुचि को भी प्रदर्शित करता है।

आयोजन की सफलता में डॉ. राजेश कुमार यादव, डॉ. तिलक साहू, डॉ. ए.एन. सिंह, डॉ. आर.के. शर्मा, डॉ. जीतेश पटेल (रायपुर), डॉ. पुरान सिंह, डॉ. खिलेंद्र सिंह, डॉ. सौरभ सिंह एवं डॉ. सृष्टि सिंह का कुशल मार्गदर्शन और महत्वपूर्ण योगदान रहा। विशेषज्ञ चिकित्सकों के मार्गदर्शन में आयोजित इस शिविर ने सामाजिक सेवा और सामूहिक सहयोग की भावना को मजबूत किया।

आयुर्वेद में औषधीय वनस्पतियों और पारंपरिक उपचार पद्धतियों का महत्वपूर्ण स्थान है। पुरानी सर्दी-जुकाम, लगातार छींक आने तथा सांस संबंधी परेशानियों से राहत की उम्मीद लेकर पहुंचे लोगों के लिए यह शिविर विशेष आकर्षण रहा। हालांकि, औषधीय खीर के लाभों को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक हैं और इसे चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

यह आयोजन संदेश देता है कि धार्मिक आस्था, सामाजिक एकजुटता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता मिलकर समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। चांदनी रात में खीर के प्रसाद के साथ वेस्ट चिरमिरी पोंडी में जीवंत हुई यह परंपरा लोगों के लिए श्रद्धा, सेवा और सांस्कृतिक विरासत का यादगार अवसर बनी।

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