अन्नदाता पर कुदरत और सरकारी सिस्टम की दोहरी मार! पहले बाढ़-बारिश ने तोड़ी कमर, अब चक्रवाती तूफान ‘अर्नव’ ने बर्बादी की कगार पर पहुंचाई धान की फसल

मुआवजे की आस में मंत्रालयों के चक्कर काट रहे किसान, पुरानी आपदा की राहत अब तक नहीं मिली, नई तबाही ने बढ़ाई चिंता;

छत्तीसगढ़ – प्रदेश का अन्नदाता इन दिनों दोहरी नहीं, बल्कि चौतरफा मार झेलने को मजबूर है। एक तरफ कुदरत का कहर किसानों की मेहनत और उम्मीदों को उजाड़ रहा है, तो दूसरी तरफ सरकारी प्रक्रियाओं की सुस्त रफ्तार उनके जख्मों पर मरहम लगाने के बजाय दर्द और बढ़ा रही है। पहले बाढ़ और लगातार बारिश ने किसानों की खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। इस प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान का मुआवजा आज तक कई किसानों तक नहीं पहुंच पाया है। राहत राशि की फाइलें मंत्रालयों और सरकारी दफ्तरों में घूम रही हैं, जबकि खेतों में बर्बाद हुई फसल के साथ किसान मुआवजे की राह देख रहे हैं।

अभी किसान पिछली आपदा के नुकसान से उबर भी नहीं पाए थे कि चक्रवाती तूफान ‘अर्नव’ ने एक बार फिर उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। तूफान के प्रभाव से हुई बारिश के चलते धान के खेतों में पानी भर गया है। पकने की कगार पर खड़ी धान की फसल जलभराव के कारण बर्बादी की ओर बढ़ रही है। जिस फसल को तैयार करने में किसानों ने महीनों की मेहनत, पूंजी और उम्मीदें लगाई थीं, उसी पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

वैसे मुख्यमंत्री की ओर से नुकसान का आकलन कर मुआवजा देने का भरोसा जरूर दिलाया जा रहा है, लेकिन किसानों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि राहत आखिर कब मिलेगी और कितनी मिलेगी? उनका कहना है कि सरकारी योजनाएं और घोषणाएं अक्सर कागजों तक सिमटकर रह जाती हैं, जबकि वास्तविक जरूरत के समय मदद समय पर नहीं पहुंचती।

आज छत्तीसगढ़ का किसान आसमान से बरसती आफत और सरकारी फाइलों की सुस्ती के बीच पिस रहा है। सवाल सिर्फ फसल बर्बादी का नहीं, बल्कि उस अन्नदाता के भविष्य का है, जो पूरे प्रदेश का पेट भरता है।

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