भिलाई के स्क्रैप खेल पर अब सीबीआई की नजर -अफसर, कारोबारी और रसूखदारों के गठजोड़ की परतें खुलने का इंतजार
छत्तीसगढ़ – करोड़ों के स्क्रैप कारोबार में उठते सवालों ने महारत्न कंपनी सेल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भिलाई स्टील प्लांट में स्क्रैप घोटाले की शिकायतों और मामले में अधिकारियों समेत 21 लोगों की गिरफ्तारी के बाद अब राज्य सरकार द्वारा सीबीआई जांच की अनुशंसा किए जाने से जांच का दायरा और गहरा होने की संभावना है।
नीलामी से उठाव तक—कहां बनता है खेल?

भिलाई स्टील प्लांट में स्क्रैप की नीलामी, मूल्य निर्धारण, सामग्री की पहचान, तौल, भुगतान और वास्तविक उठाव—हर चरण में पारदर्शिता जरूरी है। यदि किसी संगठित सिंडिकेट ने इन प्रक्रियाओं में मिलीभगत कर लाभ उठाया है, तो जांच का सवाल केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह भी पता लगाया जाना जरूरी है कि निर्णयों से किसे आर्थिक फायदा मिला और इसके पीछे कौन कौन प्रभावशाली कारोबारी या अन्य रसूखदारो का नेटवर्क सक्रिय था।
सिर्फ 21 गिरफ्तारियों से खत्म नहीं होगा मामला-
वैसे करोड़ो अरबो के इस घोटाले मे बड़ी संख्या मे अधिकारियों की गिरफ्तारी महत्वपूर्ण कार्रवाई हो सकती है, लेकिन असली सवाल उस तंत्र का है जिसने कथित गड़बड़ी को लंबे समय तक संभव बनाया। जांच में नीलामी रिकॉर्ड, ई-ऑक्शन डेटा, तौल पर्चियां, भुगतान विवरण, सीसीटीवी फुटेज, ठेकेदारों और खरीदारों के बीच लेनदेन तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका का फोरेंसिक परीक्षण होना अब अनिवार्य माना जा रहा है
SECL पर भी निगरानी जरूरी-
इसी संदर्भ में महारत्न कम्पनियो मे शामिल कोल इंडिया की एसईसीएल खदानों में स्क्रैप और नीलामी प्रक्रियाओं को लेकर उठने वाली शिकायतों की भी स्वतंत्र समीक्षा जरूरी है। वहां मामलों का पैमाना छोटा होने से संभावित अनियमितताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि दबी जुबान मे यहाँ भी इस प्रकार के कारोबार मे हेराफेरी की खबरें जोरो पर है
सिस्टम बदले बिना सिंडिकेट नहीं टूटेंगे-
छत्तीसगढ़ के भिलाई और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में स्क्रैप नीलामी की रियल-टाइम डिजिटल निगरानी, स्वतंत्र ऑडिट, खरीदारों की बेनामी/संबद्धता जांच, तौल व्यवस्था की थर्ड-पार्टी निगरानी और अधिकारियों के नियमित रोटेशन को अनिवार्य किया जाना चाहिए। वहीं संवेदनशील प्रक्रियाओं में एक ही अधिकारी को लंबे समय तक अधिकार देना बंद होने पर काम होना चाहिए l
कहा जाता है कि सीबीआई जांच होती है तो उसका उद्देश्य केवल आरोपियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि पैसे, प्रक्रिया और प्रभाव के पूरे नेटवर्क तक पहुंचना होना चाहिए। तभी सार्वजनिक संपत्ति के कथित नुकसान और लंबे समय से चले आ रहे स्क्रैप कारोबार की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।






