हाथी आते हैं, अलर्ट जारी होता है… फिर आगे की जिम्मेदारी किसकी?
छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में कई दसको से जारी मानव-हाथी संघर्ष, समाधान की जगह वन प्रबंधन चेतावनी और मुआवजे व सूचनाओ तक सिमट जाने के आरोप अब सामने आने लगे है जबकि इस संघर्ष से वनवासियो व ग्रामीणों की स्तिथि दिनों दिन दयनीय होती जा रही है और बदले मे लोगो को मंत्री मंत्रालय व अधिकारियो से हमेशा मिलते रहते है आश्वासन दर आश्वासन?
विषय विशेषज्ञयो के अनुसार छत्तीसगढ़ मे इस संघर्ष व टकराव का परिणाम बहुत भयावह सामने आ रहा है वर्तमान मे हाथियों का समूह एमसीबी सरगुजा होते हुए अब जशपुर प्रवास पर पहुंच गया है
वैसे 2000 से 2023 के बीच छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष की 828 घटनाओं के अध्ययन में 737 लोगों की मौत और 91 लोगों के घायल होने का आंकड़ा सामने आया है। वहीं जशपुर, धरमजयगढ़ और सूरजपुर सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में रहे।
इसी प्रकार 2025 की केंद्र सरकार से संबद्ध रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ के 321 गांवों को मानव-हाथी संघर्ष से प्रभावित बताया गया। इनमें जशपुर के 66, सरगुजा के 45 और धरमजयगढ़ व बलरामपुर के 35-35 गांव शामिल रहे हैं।

सवाल अलर्ट का नहीं, स्थायी समाधान का –
जानकारों के अनुसार झारखंड और ओडिशा की ओर से हाथियों के दल लगातार उत्तरी छत्तीसगढ़ में प्रवेश करते हैं। गांवों के आसपास हाथियों की मौजूदगी की सूचना देना जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल ‘हाथी प्रभावित क्षेत्र’ लिख देने या ग्रामीणों को सतर्क कर देने से वन विभाग की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है?

वास्तव मे वन विभाग की लचर कमजोर कार्यप्रणाली से सरगुजा, सूरजपुर, जशपुर और एमसीबी में ग्रामीणों के सामने रात-रातभर जागने, जान व फसल बचाने और घरों की सुरक्षा की चुनौती बनी रहती है। हाथियों के हमले में मकान और संपत्ति क्षतिग्रस्त होने के मामले भी लगातार सामने आते रहे हैं। जिसमे कुछ दिनों तक हो हल्ला होने के बाद सारा मामला पहले जैसा शांत पड़ जाता है
गलियारे कहां हैं, ठोस योजना कहां है?
वैज्ञानिक अध्ययन मानव-हाथी संघर्ष के पीछे वन आवास का विखंडन, कृषि विस्तार और प्राकृतिक भोजन की कमी जैसे कारणों को प्रमुख मानता है तथा हाथी गलियारों की सुरक्षा और स्थानीय स्तर पर स्थायी उपायों की जरूरत बताता है। जिस पर बड़ी बड़ी ठोस योजनाएं तो बड़े बड़े भवनो व एसी कक्षों मे बनती है लेकिन कागजी खानापूर्ति व भयंकर प्रचार प्रसार के बाद मामला जहाँ से चला था वहीं पहुंच जाता है लेकिन तब तक शासन व विभाग का बहुत खजाना खाली होने के आरोप भी सामने आने व लगने लगते है
मुआवजा जीवन का विकल्प नहीं-
वैसे सरकारी मुआवजा पीड़ित परिवार को तत्काल राहत दे सकता है, लेकिन किसी ग्रामीण की जान, उजड़ा घर या बर्बाद फसल वापस नहीं ला सकता। फिर भी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा घटना के बाद पंचनामा, मुआवजा और अगली चेतावनी तक सीमित दिखाई देने तक सिमित हो जाना सरकारी योजनाओं के कमजोर व फेल होने के कारण बताये जाते है
जिससे सबसे बड़ा सवाल
यदि कई दशक से समस्या बनी हुई है, तो हाथियों के स्थायी आवास, सुरक्षित कॉरिडोर, गांवों की पुनर्व्यवस्था, वैज्ञानिक निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया की समेकित योजना अब तक जमीन पर क्यों नहीं दिखती?
ग्रामीणों का अब सीधा सवाल व व आरोप यह बनता जा रहा है कि हर बार हाथी जंगल से निकलकर गांव में क्यों आए और वन विभाग हर बार उसके बाद क्यों जागे?
और इससे भी बड़ा सवाल सरकार से अब यह होता जा रहा है कि क्या मानव-हाथी संघर्ष को रोकने की जिम्मेदारी केवल ग्रामीणों को ‘सावधान’ करने तक सीमित रह गई है?
वास्तव मे हाथी भी वन्यजीव हैं और ग्रामीण भी इस भूमि के निवासी—समाधान दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली ठोस, दीर्घकालीन रणनीति में ही है। देखना दिलचस्प होगा कि वह नीति सरगुजा या छत्तीसगढ़ मे सही रूप मे बनती है?






