सड़क पर मौत बनकर बैठे बेजुबान -NH-43 सबसे खतरनाक – छत्तीसगढ़ की सड़कों पर पशुओं का कब्जा

डेढ़ माह में 70 मवेशियों की मौत- बिलासपुर में एक रात में 25 गायों को रौंदा – नियम कागजों में कैद-टोल कंपनियां भी कर रही खानापूर्ति
छत्तीसगढ़ —

छत्तीसगढ़ की सड़कें इन दिनों हाइवे कम, पशुओं का मेला ज्यादा बन गई हैं। गांव से लेकर शहर तक और स्टेट हाइवे से लेकर नेशनल हाइवे तक, जहां देखो वहीं आवारा पशुओं का कब्जा है। सबसे बुरी हालत राष्ट्रीय राजमार्ग-43 की है, जो छत्तीसगढ़ को झारखंड-एमपी से जोड़ता है। शहडोल से मनेंद्रगढ़, अंबिकापुर, बतौली, सूरजपुर तक इस हाइवे पर दिन-रात सैकड़ों मवेशी सड़क पर बैठे रहते हैं, जो बड़े हादसों को न्योता दे रहे हैं।

आंकड़े डराने वाले-
इस संबंध मे सामने आ रही जानकारियां निश्चित रूप से भयभीत करने वाली है
पिछले कुछ महीनों के आंकड़े इस लापरवाही की पोल खोलने के लिए काफी हैं –

– बिलासपुर-रायपुर नेशनल हाइवे पर एक ही रात में 25 गायों को तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने रौंद दिया, 19 की मौके पर मौत। 2 महीने में बिलासपुर में ही 100 से अधिक मवेशी हादसों में मारे गए।
– रतनपुर और इंदामरा-राजनांदगांव में एक महीने में 22 मवेशियों की मौत।
– NH-43 पर मनेंद्रगढ़ के पास केवई नदी के पास 13 मवेशियों को कुचला, 10 की मौत।
– सिर्फ डेढ़ महीने में प्रदेश में 70 से ज्यादा मवेशियों की सड़क हादसे में मौत हो चुकी है।
ऐसा नहीं है कि सशासन प्रसाशन की इस दिशा मे की जाने लापरवाहियो का खामियाजा केवल पशुधन ही उठा रहा है बल्कि हकीकत यह भी है कि सड़को पर पशुओ के चलते हादसों मे इंसान भी बड़ी संख्या मे अपनी जान गवा रहा है
सिर्फ पशुधन ही नहीं, इंसान भी सड़को पर कहा जा सकता है बेमौत मर रहे हैं।

शासकीय कड़े नियम, पर सिर्फ कागजों में–

पशुओं को सड़क पर छोड़ने पर केंद्र का मोटर व्हीकल एक्ट, पशु क्रूरता अधिनियम और राज्य सरकार की रोका-छेका योजना के तहत जुर्माना और कांजी हाउस का प्रावधान है। हाईकोर्ट ने भी कई बार सख्त आदेश दिए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत शून्य है।

जिला प्रशासन का दावा रहता है कि मवेशियों के गले में रेडियम पट्टी लगाई जाएगी, रात 7 से 12 बजे तक हांका टीम चलेगी। लेकिन ये दावे सही रूप मे कहीं नजर नहीं आते कई जिलों मे लाखो लाखो के शेड बनाये जाने का डोल पीटा जाता है लेकिन पशु पकड़ने,के साथ चारा और वैक्सीनेशन की कोई व्यवस्था नहीं होती और न ही नगर पालिका के पास सही रूप न तो कांजी हाउस होता है और न सेफ्टी किट। जिससे समस्या ज्यो कि त्यों बनी रहती है

टोल कंपनी की खानापूर्ति —

NH-43 और अन्य नेशनल हाइवे पर वाहन चालकों से भारी-भरकम टोल पूरी दमदारी से वसूला जाता है, लेकिन सड़क सुरक्षा के नाम पर टोल कंपनियां सिर्फ खानापूर्ति कर रही हैं। न तो उनकी कोई नियमित पेट्रोलिंग होती है, और न सड़क से मवेशी हटाने के लिए टीम।जिससे रात में सड़क पर मवेशी हेडलाइट में दिखते ही नहीं, जिससे गाड़ियां अनियंत्रित होकर पलट रही हैं।
इस संबंध मे पशु मालिकों पर
दूध निकालकर खुद पशुओं को सड़क पर छोड़ने के आरोप लगते हैं। वहीं सामाजिक संगठन व राजनैतिक दलों का आरोप होता है कि शासन “प्रशासन सिर्फ बातें करता है, धरातल पर कुछ नहीं।”
इस समस्या पर
लोगों का यह भी आरोप है कि छत्तीसगढ़ सरकार को जिस तरह इस दिशा में संवेदनशील होना चाहिए, वह नजर नहीं आ रहा। न तो पशुपालकों पर जुर्माना हो रहा है, न गौठानों को व्यवस्थित किया जा रहा है।इसलिए जब तक पशु मालिकों पर FIR और टोल कंपनियों पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक NH-43 मौत का हाइवे बना रहेगा।

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