ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने तेहरान पर दबाव और बढ़ा दिया है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सामने एक प्रस्ताव तैयार किया है, जिसमें ईरान के परमाणु मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) तक ले जाने की मांग की गई है। प्रस्ताव पर अगले सप्ताह IAEA बोर्ड की बैठक में चर्चा और संभावित मतदान हो सकता है।
पश्चिमी देशों का आरोप है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर IAEA के साथ पर्याप्त सहयोग नहीं कर रहा है और एजेंसी को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों तथा यूरेनियम भंडार की पूरी जानकारी और जांच की अनुमति नहीं दे रहा है। IAEA के मुताबिक, जून 2025 में ईरान के परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद उसके निरीक्षकों को कई महत्वपूर्ण स्थलों तक दोबारा पहुंच नहीं मिल पाई है।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि IAEA के पिछले आकलन के अनुसार ईरान के पास 440.9 किलोग्राम तक 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम मौजूद था। यह स्तर परमाणु हथियार बनाने के लिए आवश्यक स्तर के काफी करीब माना जाता है, हालांकि ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु हथियार विकसित नहीं कर रहा।
अगर IAEA बोर्ड प्रस्ताव को मंजूरी देता है, तो ईरान के परमाणु विवाद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। हालांकि, सुरक्षा परिषद में आगे किसी ठोस कार्रवाई की राह आसान नहीं होगी, क्योंकि रूस और चीन के पास वीटो पावर है और दोनों देशों के ईरान के साथ करीबी संबंध हैं।
ईरान ने पश्चिमी देशों की इस पहल को खारिज करते हुए इसे दबाव बनाने की कोशिश बताया है। ऐसे में आने वाले दिनों में ईरान, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच कूटनीतिक तनाव और बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मामला सुरक्षा परिषद तक पहुंचने के बाद बातचीत का रास्ता मजबूत होगा या मध्य-पूर्व में तनाव और बढ़ेगा।