सरगुजा के उदयपुर में 26 हाथियों का तीन महीने से डेरा, दहशत में वनवासी; वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

छत्तीसगढ़ – सरगुजा के उदयपुर जंगल के आसपास बसे गांवों में शाम ढलते ही डर का साया गहराने लगता है। रातों की नींद गायब है और दिन का चैन छिन गया है। सरगुजा जिले के उदयपुर क्षेत्र में पिछले करीब तीन महीने से 26 हाथियों के दल की मौजूदगी ने ग्रामीणों और वनवासियों की परेशानी बढ़ा दी है। फसलों की चिंता, घरों को नुकसान का भय और जान का खतरा उनके जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है।

बताया जा रहा है कि पानी और घास की उपलब्धता के कारण हाथियों का दल क्षेत्र में डेरा जमाए हुए है। ऐसे में सवाल उठता है कि वन विभाग आखिर कर क्या रहा है? क्या पहरेदारी और निगरानी के नाम पर औपचारिकता निभाना ही विभाग की जिम्मेदारी है? यदि हाथियों की मौजूदगी महीनों से बनी हुई है, तो अब तक ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए प्रभावी और स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं दिखाई दे रही?

वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल इसलिए भी गंभीर हैं कि खतरे के साये में जी रहे वनवासियों को केवल सतर्कता की सलाह नहीं, ठोस सुरक्षा चाहिए। समय पर सूचना, संवेदनशील गांवों में प्रभावी निगरानी, प्रशिक्षित दल और नुकसान की स्थिति में त्वरित राहत आखिर कब सुनिश्चित होगी?

शासन-प्रशासन की निष्क्रियता पर भी सवाल उठना लाजिमी है। क्या व्यवस्था किसी बड़ी जनहानि के बाद ही जागेगी? क्या फसलें बर्बाद होने और घर टूटने के बाद ही जिम्मेदारों की नींद खुलेगी?

हाथियों का संरक्षण जरूरी है, लेकिन ग्रामीणों की जान और आजीविका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ शासन और वन विभाग अब कब ठोस नीति बनाएंगे? उदयपुर के ग्रामीणों को आश्वासन नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई चाहिए।

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