कहीं सामाजिक मर्यादा तोड़ने पर रावण, कहीं जमीन बचाने के लिए पूजित दशानन!
छत्तीसगढ़ में स्थायी रावण प्रतिमाओं के पीछे छिपी आस्था, लोककथा और बदलती सामाजिक चेतना की अनूठी परंपरा
छत्तीसगढ़ – भारतीय संस्कृति में रावण का नाम आते ही अहंकार, अधर्म और अन्याय के अंत का प्रतीक दशहरा और रावण दहन की तस्वीर उभरती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में रावण की यही छवि एक अलग लोकविश्वास, सामाजिक संघर्ष और स्थानीय परंपरा के साथ दिखाई देती है। कहीं दशानन की प्रतिमा वर्षों से खड़ी है, तो कहीं उसे जलाने के बजाय सम्मानपूर्वक सहेजकर रखा गया है। यह विरोधाभास भारतीय लोकसंस्कृति की उस विविधता को सामने लाता है, जहां धार्मिक आख्यानों के साथ स्थानीय स्मृतियां और जनजीवन के अनुभव भी परंपराओं का स्वरूप गढ़ते हैं।
दहन की परंपरा के बीच स्थायी प्रतिमाओं का अनूठा संसार-

विजयादशमी पर भगवान श्रीराम की विजय और अधर्म पर धर्म की स्थापना के संदेश के साथ देशभर में रावण दहन किया जाता है। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के कुछ गांवों में, हालांकि, रावण की विशाल प्रतिमाएं केवल दशहरे के आयोजन तक सीमित नहीं हैं। लभरा खुर्द, सखतुम और कोटम जैसे गांवों में रावण की स्थायी प्रतिमाओं का उल्लेख स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में मिलता है। इन प्रतिमाओं के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ सामाजिक परिस्थितियों और ग्रामीणों की सामूहिक स्मृतियों की भूमिका भी बताई जाती है।
कहीं जमीन बचाने की जद्दोजहद, कहीं सामाजिक संदेश-
स्थानीय कथाओं के अनुसार, कुछ स्थानों पर रावण की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा सार्वजनिक जमीन और गांव के सामुदायिक स्थलों को अतिक्रमण से बचाने की भावना से जुड़ी बताई जाती है। मान्यता रही कि धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान से जुड़े स्थल पर कब्जे की आशंका कम होगी और गांव का सामूहिक अधिकार सुरक्षित रहेगा।
लोकआस्था में रावण का बहुआयामी व्यक्तित्व-
रामायण में रावण विद्वान, शिवभक्त और शक्तिशाली लंकाधिपति होने के बावजूद अहंकार तथा मर्यादा-भंग के कारण पतन का प्रतीक बनता है। वहीं, कुछ समुदायों की लोकपरंपराओं में उसके विद्वतापूर्ण पक्ष और शिवभक्ति को भी स्मरण किया जाता है। यही भारतीय परंपरा की विशेषता है कि एक ही पात्र अलग-अलग क्षेत्रों में विविध अर्थ ग्रहण कर सकता है।
परंपरा का संदेश: आस्था के साथ सामाजिक जिम्मेदारी-
छत्तीसगढ़ की स्थायी रावण प्रतिमाएं केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि लोकस्मृति, सामुदायिक पहचान और सामाजिक परिस्थितियों से जुड़े विमर्श का विषय भी हैं। दशहरे का मूल संदेश आज भी प्रासंगिक है—अन्याय, अहंकार और मर्यादा-भंग का अंत। रावण दहन हो या स्थायी प्रतिमा, भारतीय समाज के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि हम बुराई के प्रतीक को जलाने के साथ अपने भीतर की बुराइयों का दहन कितना कर पाते हैं।





