छत्तीसगढ़ मे सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल: भवन के लिए 2022 में स्वीकृति, वर्षों बाद भी निर्माण नहीं

छत्तीसगढ़ बलरामपुर में ग्रामीण क्षेत्रों की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के दावे उस समय सवालों के घेरे में आ जाते हैं, जब कहीं स्कूल है तो भवन नहीं, भवन है तो बच्चे नहीं और बच्चे नहीं तो भी शिक्षक पदस्थ मिलते हैं। सरगुजा संभाग के बलरामपुर जिले के ग्राम पंचायत बदरगांवा की तस्वीर सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

गांव में संचालित सरकारी स्कूल का भवन जर्जर होकर ध्वस्त हो गया। यहां पढ़ने वाले तीन बच्चे दूसरे स्कूलों में चले गए, लेकिन बताया जा रहा है कि दो शिक्षक अब भी इसी स्कूल में पदस्थ हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्कूल में विद्यार्थी ही नहीं हैं तो शिक्षकों की पदस्थापना और व्यवस्था की समीक्षा क्यों नहीं हुई?

2022 में मिली मंजूरी, निर्माण अब तक अधूरा-

यहाँ के स्कूल भवन निर्माण के लिए वर्ष 2022 में स्वीकृति मिलने की बात सामने आई, लेकिन इसके बावजूद भवन निर्माण नहीं हो सका। जिम्मेदारी किस स्तर पर अटकी, फाइल कहां रुकी और निर्माण क्यों नहीं हुआ—इन सवालों का जवाब ग्रामीणों को अब तक नहीं मिला है।

क्या व्यवस्था खुद सरकारी स्कूलों को कमजोर कर रही है?

बताया जाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार जर्जर होते सरकारी स्कूल भवन और दूसरी ओर निजी स्कूलों की सुविधाजनक एवं आकर्षक इमारतें अभिभावकों के सामने बड़ा विकल्प खड़ा कर रही हैं। अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें, लेकिन भवन, कक्ष, सुविधाओं और मूलभूत संसाधनों की कमी उन्हें निजी स्कूलों की ओर जाने को मजबूर कर रही है।

साजिश नहीं तो फिर जवाबदेही किसकी?

सरगुजा व बस्तर संभाग मे क्या ग्रामीण क्षेत्रों की शासकीय शिक्षा व्यवस्था की अनदेखी किसी सुनियोजित साजिश का परिणाम है? या फिर यह महज विभागीय लापरवाही और निगरानी की कमी है? यदि सरकारी स्कूल कमजोर होंगे तो इसका सीधा असर गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चों पर पड़ेगा लेकिन आरोप लगता है कि इस कमी का फायदा निजी स्कूलों के साथ अन्य जी भर के उठाने मे अभी से नहीं कई दसको से लगे है

सरकार के सामने बड़ा सवाल-

इस सबंध मे शिक्षाविदों का कहना है कि सरकार को केवल नए स्कूल खोलने की घोषणा नहीं, बल्कि मौजूदा स्कूलों के भवन, शिक्षक, विद्यार्थी और सुविधाओं की नियमित समीक्षा करनी होगी। जहां बच्चे दूसरे स्कूलों में चले गए हैं, वहां पदस्थापना की समीक्षा हो और जहां भवन वर्षों से लंबित हैं, वहां निर्माण की समयबद्ध व्यवस्था बने।

क्योंकि सरकारी स्कूल सिर्फ भवन नहीं, ग्रामीण बच्चों के भविष्य की नींव हैं। इस नींव को मजबूत करना शासन और शिक्षा विभाग व समाज की जिम्मेदारी है।

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