नशामुक्त छत्तीसगढ़ का सपना या शराब राजस्व का खेल?

एक तरफ मुख्यमंत्री का नशाखोरी के खिलाफ संकल्प, दूसरी तरफ सरकारी आबकारी व्यवस्था से शराब की बिक्री—नीति और नीयत के बीच बढ़ता विरोधाभास
छत्तीसगढ़ –
छत्तीसगढ़ को विकसित और नशामुक्त राज्य बनाने का संकल्प लेने वाले मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सामने सबसे बड़ा सवाल अब उनकी सरकार की शराब नीति को लेकर खड़ा हो रहा है। मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से नशाखोरी और अवैध शराब के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कहते रहे हैं। सरकार ने नशाखोरी पर जीरो टॉलरेंस की नीति का भी दावा किया है। लेकिन दूसरी ओर सरकारी आबकारी व्यवस्था के तहत देशी और विदेशी शराब की बिक्री जारी है। यही विरोधाभास अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन रहा है।

राजस्व बढ़ता गया, नशे की चिंता भी-

सामने आ रहीं जानकारियों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में छत्तीसगढ़ को शराब बिक्री से करीब 10,751 करोड़ रुपये का राजस्व मिला और प्रदेश में 703 शराब दुकानें संचालित होने की जानकारी सामने आई है। सवाल यह है कि जब शराब से मिलने वाला राजस्व लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है, तब नशामुक्त समाज का लक्ष्य किस प्राथमिकता के साथ हासिल होगा?

आबकारी नीति पर सबसे बड़ा सवाल-

सरकार ने 2024-25 में नई शराब दुकानें नहीं खोलने का निर्णय जरूर लिया था, लेकिन मौजूदा दुकानों को बंद करने का फैसला नहीं किया गया। वहीं 2025-26 की आबकारी व्यवस्था में भी राजस्व हित और प्रशासनिक आवश्यकता को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है। इससे सवाल उठता है कि शासन की प्राथमिकता शराब की उपलब्धता नियंत्रित करना है या उससे अधिकतम राजस्व जुटाना?

स्कूलों के बीच शराब दुकानें, परिवारों पर असर—जवाबदेही कौन लेगा?

शराब और अन्य नशीले पदार्थों की उपलब्धता को लेकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लगातार शिकायतें सामने आती हैं। महिलाओं, अभिभावकों और सामाजिक संगठनों की चिंता है कि नशे का असर परिवार की आर्थिक स्थिति, घरेलू माहौल और कानून-व्यवस्था तक पहुंचता है। ऐसे में केवल पदयात्रा, जागरूकता अभियान और योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।

पुलिस-आबकारी तंत्र की भूमिका पर भी सवाल-

मुख्यमंत्री स्वयं पुलिस को अवैध शराब और नशाखोरी पर सख्ती के निर्देश दे चुके हैं। फिर भी यदि कहीं अवैध शराब या अन्य मादक पदार्थों का कारोबार चलता है तो अब संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही व कठोर दंड तय होना समय की मांग है। विभागीय संरक्षण या मिलीभगत के आरोपों की स्वतंत्र जांच ही नहीं दंडनात्मक कार्यवाही भी होनी चाहिए—तभी नशामुक्ति के दावे पर जनता का भरोसा मजबूत होगा।

सही मायनो मे नशामुक्त छत्तीसगढ़ केवल भाषण और पदयात्रा से नहीं, बल्कि शराब नीति, राजस्व प्राथमिकताओं, प्रवर्तन व्यवस्था और वास्तविक जमीनी कार्रवाई में दिखाई देना चाहिए।

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