पंजाब में नशे का बढ़ता संकट: युवा पीढ़ी पर खतरा, मान सरकार की जवाबदेही पर सवाल

चंडीगढ़– पंजाब में नशे की समस्या एक बार फिर सियासत के केंद्र में है। नशे की गिरफ्त में फंसती युवा पीढ़ी, परिवारों की टूटती उम्मीदें और नशे के खिलाफ आवाज उठाने वालों से जुड़े हिंसक घटनाक्रम ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले नशा मुक्त पंजाब का मुद्दा राजनीतिक बहस का प्रमुख हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में पंजाब में नशे के कारोबार और संगठित अपराध पर चिंता जताते हुए भाजपा की सरकार बनने पर पंजाब को नशा मुक्त बनाने का संकल्प दोहराया। उन्होंने नशे के नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई और अपराधियों को कथित राजनीतिक संरक्षण मिलने के मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग की।

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार की कार्यशैली पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यदि नशे के नेटवर्क को शुरुआती दौर में ही प्रभावी ढंग से तोड़ने, तस्करों पर सख्त कार्रवाई करने और युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जाते, तो आज अनेक परिवारों को इस संकट का सामना शायद कम करना पड़ता।

हालांकि, पंजाब सरकार अपनी ‘युद्ध नशेयां विरुद्ध’ मुहिम के तहत गिरफ्तारियों, नशा तस्करी के खिलाफ कार्रवाई और पुनर्वास प्रयासों का दावा करती रही है। ऐसे में असली सवाल यह है कि इन अभियानों का जमीनी स्तर पर कितना असर पड़ा और नशे की उपलब्धता पर कितना नियंत्रण हुआ।

वास्तव मे पंजाब के युवाओं का भविष्य केवल राजनीतिक बयानों से सुरक्षित नहीं होगा। इसके लिए तस्करी के पूरे नेटवर्क पर प्रहार, दोषियों को सजा, नशे के आदी लोगों का उपचार और रोजगार के अवसर जरूरी हैं। जनता अब सरकार से ठोस परिणाम और जवाबदेही चाहती है। चुनाव में नशे का मुद्दा कितना प्रभाव डालेगा, यह भविष्य बताएगा, लेकिन पंजाब को इस संकट से निकालना सत्ता और विपक्ष—दोनों के लिए बड़ी चुनौती है।

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