कश्मीर में गूंजा ‘वंदे मातरम’, सम्मान में खड़े रहे उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला-क्या विवादों मे लगेगा विराम

जम्मू-कश्मीर में पहली बार आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के उद्घाटन समारोह की एक तस्वीर इन दिनों राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। श्रीनगर की डल झील के किनारे स्थित इंटरनेशनल इन्विटेशनल सेंटर में आयोजित समारोह की शुरुआत में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान बजाया गया। इस दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, उनके पिता और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला, केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह सहित सभागार में मौजूद सभी लोग सम्मान में खड़े रहे।

यह दृश्य इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि देश में इन दिनों ‘वंदे मातरम’ को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है। राष्ट्रगीत के सम्मान और उसके गायन को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे माहौल में कश्मीर से आई यह तस्वीर राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मर्यादाओं के संदर्भ में खास संदेश देती दिखाई देती है।

‘वंदे मातरम’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण स्वर बना। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे लोगों में राष्ट्रभावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।बताया जाता है कि स्वतंत्रता के बाद इसके शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया, जबकि ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान का दर्जा मिला।

हालांकि, समय के साथ ‘वंदे मातरम’ केवल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक प्रतीक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक विमर्श का हिस्सा भी बन गया। कांग्रेस, भाजपा और अन्य दल इसके सम्मान, गायन तथा इससे जुड़े ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते रहे हैं। यही कारण है कि जब भी इसके गायन या सार्वजनिक आयोजनों में इसकी भूमिका का प्रश्न उठता है, राजनीतिक बहस तेज हो जाती है।

ऐसे समय में श्रीनगर का यह दृश्य इस बात की ओर भी संकेत करता है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान लोकतांत्रिक संवाद का साझा आधार बन सकता है। जानकर कहते है कि कश्मीर से निकला यह संदेश देश की विविधता में एकता की भावना को मजबूत करने वाला माना जा सकता है।

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