दिल्ली में खड़े हो रहे तबाही के अनगिनत सेंटर- कई मंजिला इमारतें, कमजोर कॉलम है खड़ी-किसका मिला संरक्षण कौन है जिम्मेदार ?
नई दिल्ली- देश की राजधानी दिल्ली विकास की चमक के पीछे एक ऐसे खतरे को पाल रही है, जो किसी बड़े भूकंप या प्राकृतिक आपदा के समय हजारों जिंदगियों पर भारी पड़ सकता है। सत्य निकेतन में भवन गिरने की घटना के बाद निर्माण व्यवस्था और भवनों की सुरक्षा को लेकर उठे सवालों ने राजधानी की पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दिल्ली में कमजोर आधार और कथित तौर पर मानकों के विपरीत निर्माण के बावजूद कई-कई मंजिला इमारतें खड़ी की जा रही हैं? स्थानीय स्तर पर ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं कि बेहद कम चौड़ाई वाले कॉलम पर भी बहुमंजिला निर्माण कर दिए जाते हैं। जो महज भवन नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सीधे-सीधे लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ का मामला होगा।

सवाल यह उठता है कि देश की राजधानी मे बिना ठोस नीव व कालम के बहुमंजिल इमारतो के निर्माण की अनुमति आखिर कैसे मिली? नक्शा किसने पास किया? निर्माण के दौरान निरीक्षण किस अधिकारी ने किया? क्या मौके पर जाकर निर्माण सामग्री, कॉलम, बीम और नींव की जांच हुई? और यदि नियम टूटे तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
इस संबंध मे सबसे गंभीर सवाल भ्रष्टाचार और कथित राजनीतिक-अधिकारी संरक्षण के आरोपों का है। बिना किसी तंत्र की मिलीभगत के अवैध निर्माण लंबे समय तक खड़े रहना संभव है या नहीं, इसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है।

विशेषज्ञ कहते है कि दिल्ली भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्र में आती है। ऐसे में कमजोर और अनधिकृत बहुमंजिला इमारतों की बड़ी संख्या किसी बड़े भूकंप की स्थिति में तबाही का केंद्र बन सकती है। पुरानी दिल्ली और घनी आबादी वाले इलाकों में यह खतरा और गंभीर हो जाता है।
जिसको देखते हुए किसी भीषण दुर्घटना का इंतजार किये बिना
अब जरूरत खानापूर्ति की नहीं, बल्कि दिल्ली की इमारतों का व्यापक स्ट्रक्चरल ऑडिट, दोषी अधिकारियों की जवाबदेही और खतरनाक भवनों पर तत्काल कार्रवाई की है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि इमारतें कैसे बनीं—सवाल यह है कि अगर कल भूकंप आया तो इनके मलबे के नीचे कौन दबेगा और जिम्मेदारी किसकी होगी?





