तीसरे मोर्चे की आहट-उत्तरप्रदेश मे किसके लिए बढ़ी बेचैनी?

उत्तर प्रदेश में AIMIM, राष्ट्रीय ओलमा काउंसिल और पीस पार्टी जैसे छोटे दलों के बीच तालमेल की चर्चाओं ने तीसरे मोर्चे की संभावनाओं को हवा दी है। छन छन कर आ रही खबरों के मुताबिक इन दलों की ओर से मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर साझा मंच की गुप्त कवायद चल रही है।

इसका सीधा असर समाजवादी पार्टी की उस रणनीति पर पड़ सकता है, जिसमें मुस्लिम, पिछड़े और दलित वर्गों को PDA के तहत जोड़ने की कोशिश है।वहीं ओवैसी लगातार अखिलेश यादव की इसी राजनीति को चुनौती देते हुए मुस्लिमों को अलग राजनीतिक हिस्सेदारी देने की बात कर रहे हैं। दूसरी ओर

कांग्रेस के लिए भी यह चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विपक्षी वोटों का बंटवारा सीट-दर-सीट चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। 2022 में AIMIM ने करीब 95 सीटों पर चुनाव लड़ा था और लगभग 4.5 लाख वोट हासिल किए, लेकिन कोई सीट नहीं जीत सकी। लेकिन बहुतो का खेल बिगाड़ दिया था

क्या बीजेपी को फायदा मिल सकता है?
उत्तरप्रदेश की राजनीति मे नजर रखने वालों का कहना है कि इस नए समीकरण से भाजपा को फायदा मिलेगा कि नहीं ये
तस्वीर सीट-विशेष पर निर्भर करेगी। अगर किसी सीट पर AIMIM या छोटे दल विपक्षी उम्मीदवारों के वोटों में विभाजन पैदा करते हैं, तो मुकाबले का परिणाम प्रभावित हो सकता है। लेकिन इसे सीधे बीजेपी के फायदे के रूप में तय मानना जल्दबाजी होगी।

फिलहाल असली सवाल यह है कि ओवैसी अकेले चुनावी मैदान में उतरेंगे या छोटे दलों को साथ लेकर बड़ा सामाजिक गठजोड़ बनाएंगे। यही फैसला तय करेगा कि यूपी में तीसरे मोर्चे की आहट महज राजनीतिक दबाव है या चुनावी गणित बदलने वाली वास्तविक चुनौती।

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