नकली शराब के साये में आबकारी तंत्र- कार्रवाई के बावजूद नहीं थम रहे सवाल

कुम्दा में नकली शराब की सामग्री बरामदगी ने खोली निगरानी व्यवस्था की पोल- चिरमिरी से कोरिया-एमसीबी तक उठ रहे सवाल-सेल्समैन से लेकर अफसरों तक जांच की मांग
छत्तीसगढ़ – मध्य प्रदेश के सागर जिले के बंडा में जहरीली शराब से हुई मौतों ने पूरे शराब तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी बीच छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में कुम्दा निवासी चंद्रप्रकाश राजवाड़े की नकली शराब बनाने के आरोप में गिरफ्तारी और शराब के ढक्कन, रेपर सहित अन्य सामग्री की बरामदगी ने आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर फिर बहस छेड़ दी है।

सबसे गंभीर बात यह है कि पूछताछ में राजवाड़े द्वारा कथित तौर पर सूरजपुर की सरकारी शराब दुकान मे तैनाती के समय नकली अथवा मिलावटी शराब तैयार करने की प्रक्रिया सीखने की बात सामने आ रही है। तो सवाल केवल एक आरोपी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी शराब दुकानों की निगरानी, स्टॉक व्यवस्था और वहां तैनात कर्मचारियों की भूमिका तक पहुंचेगा।

■ जिम्मेदार कौन?

इस सबंध मे जनप्रतिनिधियों का कहना है कि छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग से किसी तरह नकली शराब बनाने वाला एक व्यक्ति तो कानून के शिकंजे में आ गया, लेकिन यदि सरकारी दुकान से ऐसी गतिविधियों की जानकारी या तकनीक बाहर पहुंची, तो जिम्मेदारी तय करने की जवाबदेही किसकी होगी? सेल्समैन, ठेका संचालन व्यवस्था और निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच कौन करेगा?

■ जांच के बड़े सवाल

क्या शराब दुकानों के स्टॉक का नियमित मिलान होता है?
क्या संदिग्ध शराब के नमूनों की प्रयोगशाला जांच कराई जाती है?
क्या शिकायतों के बाद संबंधित दुकानों का रिकॉर्ड और सीसीटीवी खंगाला गया?
क्या चिरमिरी सहित पूर्व शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा हुई?
क्या एमसीबी और कोरिया या अन्य जिलों में औचक जांच वास्तव में प्रभावी है?

■ विभाग से सीधे सवाल

1. शिकायतों पर कितनी कार्रवाई हुई और उसका परिणाम क्या रहा?
2. कितने सेल्समैनों पर अनियमितता के मामले में कार्रवाई हुई?
3. सरकारी दुकानों से शराब की आपूर्ति और बिक्री का ऑडिट कितनी नियमितता से होता है?
4. कुम्दा मामले में कथित सरकारी दुकान कनेक्शन की जांच होगी या नहीं?
5. क्या वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी स्वतंत्र जांच होगी?

■ अब कार्रवाई सिर्फ दिखावे की नहीं

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और शराब उपभोक्ताओं के बीच भी मांग उठ रही है कि एमसीबी, कोरिया और पूरे सरगुजा संभाग में शराब दुकानों की औचक जांच, स्टॉक सत्यापन, नमूनों की वैज्ञानिक जांच और शिकायतों की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए। सवाल यह नहीं कि एक आरोपी पकड़ा गया या नहीं—सवाल यह है कि नकली शराब तैयार होने और बाजार तक पहुंचने की संभावित पूरी कड़ी की जांच कब होगी। मध्यप्रदेश के सागर जिले मे बंडा जैसी त्रासदी का इंतजार करने के बजाय आबकारी तंत्र को अब पारदर्शी और प्रभावी कार्रवाई से अपनी निगरानी व्यवस्था साबित करनी होगी। वरना मिलीभगत व भ्रष्टाचार के आरोप जनप्रतिनिधियों द्वारा यू ही लगते रहेंगे?

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