दल बदल की सियासत तेज: विचारधारा पीछे, टिकट और निजी स्वार्थ आगे!
एमसीबी से कोरिया तक राजनीतिक पाला बदलने की होड़, निकाय चुनाव में किसे मिलेगा फायदा और किसे नुकसान?
छत्तीसगढ़ – में नगरीय निकाय चुनावों की सरगर्मी भले ही हर जिले में एक जैसी न हो, लेकिन सरगुजा संभाग के एमसीबी और कोरिया जिले में दल बदल की राजनीति ने सियासी माहौल गरमा दिया है। कहीं कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने की चर्चा है, तो कहीं भाजपा से निराश लोग कांग्रेस में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यह बदलाव विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता है या टिकट और निजी स्वार्थ की राजनीति?
एमसीबी जिले के खड़गवां में स्थानीय विधायक एवं स्वास्थ्य मंत्री की उपस्थिति में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के भाजपा में शामिल होने की जानकारी सामने आई थी। वहीं, पूर्व कांग्रेस विधायक गुलाब कमरो की मौजूदगी में ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के कांग्रेस में शामिल होने की बात भी सामने आई। दूसरी ओर, कोरिया जिले में कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय पदाधिकारी प्रशांत मिश्रा की उपस्थिति में करीब 50 लोगों के कांग्रेस प्रवेश की जानकारी सामने आई है।

चर्चा यह भी है कि इनमें कुछ ऐसे लोग शामिल हैं, जो भाजपा की ओर से वार्ड प्रत्याशी बनने की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन टिकट की संभावनाएं कमजोर पड़ने पर उन्होंने कांग्रेस के माध्यम से अपनी राजनीतिक किस्मत आजमाने का रास्ता चुना। हालांकि, इन प्रवेशों के पीछे वास्तविक कारण संबंधित लोगों की राजनीतिक प्राथमिकताओं और परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।
टिकट की चाह या विचारधारा से जुड़ाव?

नगरीय निकाय चुनावों में वार्ड स्तर के समीकरण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में दल बदल से राजनीतिक दलों को तत्काल समर्थकों की संख्या बढ़ने और चुनावी माहौल बनाने का लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि दूसरे दल से आए लोगों को टिकट नहीं मिलता या पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा होती है, तो यही कदम अंदरूनी असंतोष और गुटबाजी का कारण भी बन सकता है।
मतदाताओं के फैसले पर निर्भर होगा असर-
बैकुंठपुर नगर पालिका और चर्चा-शिवपुर क्षेत्र में होने वाले नगरीय निकाय चुनावों के मद्देनजर कोरिया जिले में इस तरह के राजनीतिक घटनाक्रम का असर महत्वपूर्ण हो सकता है। वहीं, एमसीबी में फिलहाल निकाय चुनाव नहीं होने के बावजूद दल बदल भविष्य के राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
आखिरकार, दल बदल से भीड़ और राजनीतिक संदेश जरूर बनता है, लेकिन जीत की गारंटी नहीं मिलती। मतदाता यह देखेंगे कि कौन उनके मुद्दों, विकास और स्थानीय समस्याओं के साथ खड़ा है। ऐसे में असली परीक्षा दल बदलने वालों की नहीं, बल्कि यह साबित करने की होगी कि उनका फैसला जनसेवा के लिए है या केवल राजनीतिक लाभ के लिए।





