बाहुबली की सियासत पर सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा! अनंत सिंह को झटका, क्या बिहार में अब नहीं चलेगा बाहुबल का दबदबा?

सत्ता की सरपरस्ती या बाहुबल का अहंकार? अनंत सिंह पर कानून का शिकंजा, एक दिसंबर तक सरेंडर का आदेश!

पटना – बिहार की सियासत में बाहुबल, रसूख और सत्ता के गठजोड़ की कहानी एक बार फिर सुर्खियों में है। मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह को सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा झटका दिया है, जिसने बिहार की राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दुलारचंद यादव हत्याकांड में अदालत ने उनकी जमानत रद्द करते हुए एक दिसंबर 2026 तक सरेंडर करने का आदेश दिया है। साथ ही बिहार पुलिस को चार महीने में जांच पूरी करने का निर्देश दिया है।

इस सबंध मे सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी महत्वपूर्ण है। अदालत ने माना कि पटना हाईकोर्ट ने जमानत देते समय अपराध की गंभीरता और अनंत सिंह के आपराधिक इतिहास पर पर्याप्त विचार नहीं किया था। हालांकि, हत्याकांड में उनकी भूमिका अभी न्यायिक विचाराधीन है और आरोपों का अंतिम फैसला ट्रायल में होगा।

अनंत सिंह की पहचान बिहार में लंबे समय से बाहुबली नेता के रूप में रही है। राजनीतिक प्रभाव, समर्थकों की ताकत और विवादित बयानों के कारण वह लगातार चर्चा में रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनकी नजदीकियां भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रही हैं। लेकिन पार्टी नेतृत्व के निर्देशों के विपरीत राजनीतिक गतिविधियों और बगावती तेवरों के बाद जेडीयू ने उन्हें छह साल के लिए निष्कासित कर दिया।

अब सवाल केवल अनंत सिंह की जमानत का नहीं, बल्कि बिहार की राजनीतिक संस्कृति का है। क्या दशकों से चुनावी समीकरणों में प्रभाव रखने वाले बाहुबलियों का दौर बदल रहा है? क्या राजनीतिक दल अब बाहुबलियों को साथ रखने के बजाय उनसे दूरी बनाने की रणनीति अपना रहे हैं?

बिहार की जनता आखिर कब तक सत्ता, अपराध और प्रभाव के इस कथित गठजोड़ की कीमत चुकाएगी?

लोकतंत्र में विधायक की पहचान उसके बाहुबल से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, विकास और कानून के प्रति जवाबदेही से होनी चाहिए। अनंत सिंह प्रकरण बिहार की राजनीति के सामने यही बड़ा सवाल खड़ा करता है—सत्ता बड़ी है, बाहुबल बड़ा है या कानून?

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