फैक्ट्रियों का धुआं बनेगा देश की तरक्की का नया कच्चा माल, कार्बन डाईऑक्साइड से सीमेंट, रसायन और ईंधन बनाएगा भारत
20 हजार करोड़ रुपये की ऐतिहासिक पहल से खुलेगा नई तकनीक का रास्ता, मध्य प्रदेश और राजस्थान बनेंगे कार्बन उपयोग की औद्योगिक क्रांति के अहम केंद्र
नई दिल्ली- अब तक उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड को पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती माना जाता रहा है, लेकिन भारत सरकार इसी प्रदूषण को आर्थिक संपदा में बदलने की तैयारी कर रही है। यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण का प्रयास नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक और औद्योगिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी छलांग है। केंद्र सरकार ने कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) तकनीक को बढ़ावा देने के लिए पांच वर्षों में 20 हजार करोड़ रुपये के प्रावधान को मंजूरी दी है।

इस योजना के तहत बिजली, सीमेंट, इस्पात, रिफाइनरी और रसायन उद्योगों से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड को पकड़कर उससे उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाएंगे। इसी गैस से निर्माण सामग्री, सिंथेटिक ईंधन, रासायनिक पदार्थ और औद्योगिक उत्पाद बनाने की संभावनाएं विकसित होंगी।
इस राष्ट्रीय अभियान में मध्य प्रदेश और राजस्थान की भूमिका विशेष महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश के विंध्याचल में एनटीपीसी का 3,000 टन सालाना क्षमता वाला कार्बन से मेथनॉल बनाने का संयंत्र चालू हो चुका है। बीना रिफाइनरी में प्रतिदिन 15 टन कार्बन डाईऑक्साइड से कैल्शियम कार्बोनेट बनाने की परियोजना प्रस्तावित है। राजस्थान में जेके सीमेंट के साथ हल्के कंक्रीट उत्पाद और ओलेफिन बनाने की तकनीक पर काम प्रस्तावित है। जैसलमेर क्षेत्र में भूमिगत सुरक्षित भंडारण की संभावनाएं भी जांची जा रही हैं।
इस दिशा में आईआईटी मुंबई में मई 2026 में शुरू हुई देश की पहली एकीकृत CCUS फील्ड प्रयोगशाला ऐतिहासिक उपलब्धि है। यहां प्रतिदिन तीन टन तक कार्बन डाईऑक्साइड पकड़ने, उसका उपयोग करने और भूगर्भ में सुरक्षित भंडारण की तकनीक का परीक्षण किया जा सकता है।
सरकार की यह दूरदर्शी पहल भारत को विदेशी तकनीक पर निर्भरता घटाने, स्वदेशी अनुसंधान, नए औद्योगिक रोजगार और वैज्ञानिक कौशल विकसित करने का अवसर देगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रदूषण को संसाधन में बदलकर विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकेगा। यही विकसित, आत्मनिर्भर और हरित भारत की दिशा में सार्थक प्रगति है।





