देश में ही बनेंगे यूएवी, ड्रोन, एंटी-शिप मिसाइल के टर्बोजेट इंजन,और हैदराबाद की एक कंपनी ने 24 माह में यह कमाल
देश के वैज्ञानिको ने कर दिया कमाल — हैदराबाद -जी हाँ विश्वास करिये अब *देश में ही बनेंगे यूएवी, ड्रोन, एंटी-शिप मिसाइल के टर्बोजेट इंजन,और हैदराबाद की एक कंपनी ने 24 माह में यह कमाल*कर दिखाया है और दूसरा आश्चर्य यह रहा कि इस कम्पनी के मालिक का दसवीं फेल होना भी उनके मार्ग मे बाधा नहीं बन सका
देश की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। यूएवी, ड्रोन और एंटी-शिप मिसाइल में लगने वाले छोटे आकार के टर्बोजेट इंजन अब विदेश से आयात नहीं करने पड़ेंगे, बल्कि देश में ही बनेंगे।
हैदराबाद की आजाद इंजीनियरिंग कंपनी ने यह कर दिखाया है। रक्षा मंत्रालय और डीआरडीओ ने टर्बोजेट इंजन बनाने की जिम्मेदारी कंपनी को सौंपी थी। कंपनी के चेयरमैन और सीईओ राकेश चोपदार को भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता पर भरोसा था और 130 वैज्ञानिकों, इंजीनियरों व तकनीशियनों की टीम ने 24 महीने में इस भरोसे को हकीकत में बदल दिया।
डीआरडीओ की गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) ने इंजन का डिजाइन तैयार किया और कंपनी ने उसके मुताबिक जटिल पुर्जे बनाकर पूरे इंजन को तैयार और असेंबल किया।

अब तक भारत इस श्रेणी के टर्बोजेट इंजन के लिए विदेशों पर निर्भर रहा है। परिवर्तन की खास बात यह है कि आजाद इंजीनियरिंग केवल इंजन के पुर्जे नहीं बना रही, बल्कि पूरा इंजन सिस्टम तैयार कर डिलीवर कर रही है। कंपनी को बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार रहने को कहा गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में देश में ऐसे इंजनों की मांग बड़े पैमाने पर बढ़ेगी। स्वदेशी उत्पादन से आयात पर निर्भरता घटने के साथ-साथ लागत कम करने में भी मदद मिलेगी और मेक इन इंडिया को मजबूती मिलेगी।
पता हो
10वीं में फेल, पिता की फैक्ट्री में मशीनें चलाकर आगे बढ़े है कंपनी के चेयरमेन राकेश चोपदार
हैदराबाद की इस सफलता के पीछे राकेश चोपदार की संघर्ष भरी कहानी है। 10वीं में फेल होने पर परिवार के लोगों ने उन्हें ‘किसी काम का नहीं’ तक कहा था।
उन्होंने पढ़ाई का पारंपरिक रास्ता छोड़कर मशीनों के बीच भविष्य तलाशा। पिता की फैक्ट्री में घंटों काम किया, मशीनों और पुर्जों को समझा और काम करते-करते इंजीनियरिंग की बारीकियां सीखीं।
12 साल पिता की फैक्ट्री में काम करने के बाद 2008 में उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया। शुरुआत महज 200 वर्गमीटर की जगह और सेकंड हैंड सीएनसी मशीन से हुई। पहला ऑर्डर भी बड़ा नहीं था। यूरोप की एक कंपनी के लिए ताप विद्युत संयंत्रों के टर्बाइन में लगने वाले एयरफॉइल बनाने थे, जिसके लिए कुछ हजार डॉलर मिले।
चोपदार के मुताबिक, उस दौर में विदेशी कंपनियों को भरोसा नहीं होता था कि भारत में कोई कंपनी इतने जटिल थ्री-डी रोटेटिंग पुर्जे बना सकती है। आज उनकी कंपनी रोल्स-रॉयस, बोइंग, जीई समेत कई विदेशी कंपनियों के लिए पुर्जे बनाती है। 2008 में कंपनी का कारोबार 2 करोड़ रुपये था, अब पूंजीकरण 17,552 करोड़ रुपये है। कंपनी में 2,200 कर्मचारी हैं और उत्पादन का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा निर्यात किया जाता है।






