हिमालय में बन रहा है ‘वाटर बम’ -30 लाख भारतीयों पर मंडरा रहा है GLOF का खतरा

नई दिल्ली- नेपाल मे अचानक आई विपदा व तबाही से भारत ही नहीं विश्व के कई देशों ने वर्तमान से सबक लेकर भविष्य की तैयारियो के लिए सोचने पर विवश कर दिया है क्योंकि वैज्ञानिको के अनुसार
उत्तराखंड के केदारनाथ और धराली के बाद नेपाल में आई तबाही का पैटर्न लगभग एक जैसा था। तीनों जगह तबाही की वजह एक ही – हिमालय में फटा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF, जिसे अब ‘वाटर बम’ कहा जा रहा है। यह बताता है कि जलवायु परिवर्तन के असर से हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच बन रही सैकड़ों ग्लेशियल झीलें कभी भी तबाही ला सकती हैं।
यही ‘वाटर बम’ अब भारत के लिए भी सबसे बड़ा हिमालयी खतरा बन गया है।

दुनिया में 1.50 करोड़ लोगों पर जोखिम- भारत में 30 लाख- वैज्ञानिक जानकारियों के अनुसार

दुनिया में करीब 1.50 करोड़ लोग संभावित ग्लोफ के प्रभाव क्षेत्र में रहते हैं। इनमें अकेले भारत की करीब 30 लाख आबादी है। यह उन लोगों की संभावित आबादी है, जो किसी ग्लेशियल झील के टूटने पर बनने वाली बाढ़ के अनुमानित प्रभाव क्षेत्र में रहते हैं। यानी हिमालय की ऊंचाई पर बनी एक झील का खतरा सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है। उसका असर नीचे बसे गांवों, कस्बों, शहरों और नदी घाटियों तक पहुंच सकता है।

*क्यों फट रहा है वाटर बम?
यह सवाल अब विचारणीय प्रश्न बन गया है बताया जाता है कि
झीलों को रोकने वाले प्राकृतिक बांध बर्फ, चट्टान और मलबे से बने होते हैं। ये कंक्रीट के बांध जैसे मजबूत नहीं होते। ऐसे में भारी बारिश, हिमस्खलन या भूकंप से झील का बांध टूटने से पानी के साथ चट्टान और मलबे का सैलाब तेजी से नीचे आ कर आबादी बस्तियों के साथ सड़क, पुल और बिजली परियोजनाओं पर जान माल के नुकसान के साथ भारी तबाही मचाते है

चिंता इसलिए बड़ी -क्योंकि 30 साल में 83% बढ़ी झीलें-

फ्रंटियर अर्थ साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक 1990 में हिमालय क्षेत्र में 0.01 किमी से बड़ी 2406 झीलें थीं, जो 2020 में बढ़कर 4420 हो गईं। यानी 83% की वृद्धि। 329 झीलों के अध्ययन में ऐसी झीलों के क्षेत्रफल में 15.84% की वृद्धि पाई गई।

वजह साफ है – ग्लेशियरों का पीछे हटना और उसकी जगह नई झीलों का बनना। हिमालय में खतरे की सबसे बड़ी वजह यही है।

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