झारखंड DGP नियुक्ति विवाद: सुप्रीम कोर्ट में उठे गंभीर सवाल, छह महीने की सेवा वाले नियम मुद्दा
झारखंड की पुलिस महानिदेशक (DGP) तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में
गंभीर सवाल उठाए गए हैं। न्यायमित्र (Amicus Curiae) और वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अदालत के समक्ष दाखिल अपनी रिपोर्ट में कहा है कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के अनुरूप नहीं थी।
तदाशा मिश्रा को झारखंड सरकार ने 30 दिसंबर 2025 को राज्य का DGP नियुक्त किया था, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति अगले ही दिन यानी 31 दिसंबर 2025 को निर्धारित थी। यानी नियुक्ति के समय उनकी सेवा में केवल एक दिन बचा था।

मामले में मुख्य विवाद सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों को लेकर है। इन निर्देशों के तहत DGP पद के लिए ऐसे अधिकारी पर विचार किया जाना चाहिए जिसकी सेवानिवृत्ति में कम से कम छह महीने का कार्यकाल शेष हो। इसका उद्देश्य पुलिस प्रमुख के पद पर स्थिरता और पारदर्शी नियुक्ति सुनिश्चित करना है।
एमिकस क्यूरी ने अदालत को बताया कि सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले नियमित DGP के रूप में नियुक्ति इन सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है। रिपोर्ट में झारखंड की DGP नियुक्ति नियमावली, 2025 के कुछ प्रावधानों पर भी स्पष्टीकरण और अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई गई है, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया में मनमानी या राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश न रहे।

यह मामला झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की याचिका से जुड़ा है, जिसमें राज्य सरकार द्वारा DGP की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित नियमों में किए गए बदलावों को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले में आगे सुनवाई करेगा।





