छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों में विकास के नाम पर भ्रस्टाचार का खेल- राज्य बनने से आज तक जारी है दस्तूर
भारी-भरकम कमीशन के चक्कर में हेवी मशीन व विद्युत सामग्री की गुप्त खरीदी- निकायों में आज भी चल रहा है यह खेल, कोरिया जिले की नगर पालिका में वर्ष 2015 का मामला फिर उजागर
छत्तीसगढ़ —
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद नगरीय निकायों के विकास के नाम पर जो गुप्त खेल शुरू हुआ था, वह आज भी बदस्तूर जारी बताया जाता है। सूत्रों की यदि माने तो शासन किसी का भी रहे जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों व सप्लायर के गठजोड़ से महंगी खरीदी का यह सिलसिला रुकता नहीं है।
इसके पीछे एक ही कारण है – इन सामग्रियों में मिलने वाला भारी-भरकम कमीशन बताया जाता है खबरों के बाजार में इस कमीशन का प्रतिशत इतना बताया जाता है, जिसकी कल्पना सामान्य आदमी नहीं कर सकता। लेकिन सत्यता की पुष्टि कभी हो नहीं पाती, क्योंकि सारा खेल ही गोपनीय तरीके से खेला जाता है।

कैसे खेला जाता है खेल?
सूत्रों के अनुसार इस प्रकार की खरीदी स्थानीय स्तर पर नहीं की जाती। जानबूझकर राजधानी रायपुर या देश के महानगरों की बड़ी-बड़ी कंपनियों से कोटेशन मंगाकर खरीदी दिखाई जाती है, ताकि सभी बातें रहस्य और गुप्त बनी रहें। बिलों में हेराफेरी, जरूरत से ज्यादा कीमत और बिना उपयोग की मशीनें खरीदना इसका आम तरीका है।

सामाजिक संगठनों और गांधीवादी विचारधारा वाले जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि वर्तमान में प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग के अधीन कुल *194 नगरीय निकायों मे अपने हैसियत व दर्जे के हिसाब से उनमें आज भी यही गुप्त खेल सुविधा जनक समय के अनुसार खेलने का प्रयास किया जाता है भले ही खरीदी गई हेवी मशीन, हाइड्रोलिक लैडर, ट्रैक्टर-टैंकर, फॉगिंग मशीन या महंगे विद्युत पोल और एलईडी लाइट उपयोग लायक हैं या नहीं, इसका ध्यान रखे बिना खरीदी करने के आरोप जागरूक संगठनों व राजनैतिक दलों द्वारा लगाया जाता रहा है

कड़े नियम, फिर भी निकल जाता है रास्ता-
बताया जाता है कि राजधानी में पदस्थ कुछ वरिष्ठ ईमानदार अधिकारियों ने इस पर अंकुश लगाने के लिए जेम (GeM) पोर्टल से खरीदी, टेंडर प्रक्रिया और तकनीकी स्वीकृति के कड़े नियम बनाए हैं। वही सख्त निर्देश भी जारी किए जाते हैं।
लेकिन इस कारोबार में पारंगत जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों व कारोबारियों की सांठ-गांठ इतनी मजबूत है कि वे हर नियम का कोई न कोई तोड़ खोज ही लेते हैं। स्पेसिफिकेशन इस तरह से बनाया जाता है कि सिर्फ एक ही कंपनी क्वालिफाई करे, या फिर आपातकालीन सेवा के नाम पर बिना टेंडर के खरीदी कर ली जाती है। क्योंकि सवाल आखिर कमीशन का है।
कोरिया जिले से ताजा उदाहरण-
ऐसा ही एक मामला वर्तमान में कोरिया जिले के नगर पालिका में सामने आया है। जहां वर्ष 2015 में मटन मार्केट व शहर अन्य स्थानों के अपशिष्ट का नष्टीकरण के नाम पर या विद्युत सामग्री व हेवी मशीन खरीदी में लाखो का गोलमाल होने की चर्चा फिर तेज हो गई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि खरीदी गई सामग्री आज कबाड़ में पड़ी है, जबकि उसके खरीदी पर बड़ी रकम कंपनी को भुगतान किया गया था और बताया जाता है कि इस भुगतान के बाद न तो कोरिया मे वो कंपनी आई और न ही उसका पूरा पार्ट्स व मशीन?
यह मामला सिर्फ एक नगर पालिका का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के सिस्टम की पोल खोलता है। जरूरत है कि नगरीय प्रशासन विभाग ऐसी सभी संदिग्ध खरीदीयों का थर्ड पार्टी ऑडिट कराए जाये और दोषी अधिकारियों-जनप्रतिनिधियों पर कठोर कार्रवाई किया जाये अन्यथा विकास के नाम पर कमीशन का यह खेल चलता रहेगा और जनता के टैक्स का पैसा यूं ही बर्बाद होता रहेगा।





