ब्रिक्स शिखर सम्मेलन -क्या दुनिया के तीन धुरंधर बदलेंगे वर्ल्ड ट्रेड की तस्वीर?

G7 को मिलेगी चुनौती, -डॉलर के वर्चस्व पर होगा प्रहार – ट्रंप की दादागिरी के विरुद्ध आएगा नया आर्थिक मोर्चा!

नई दिल्ली- भारत की मेजबानी में हो रहा BRICS शिखर सम्मेलन सिर्फ कूटनीति का मंच नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था का बड़ा संकेत बनकर उभरा है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS सम्मेलन में दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी रही कि क्या उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक व्यापार के पुराने नियमों को बदलने की दिशा में क्या निर्णायक कदम उठाएंगी।

इस सबंध मे आर्थिक मामलो के जानकारों का कहना है कि BRICS 11 देशों का विस्तारित समूह है, जो दुनिया की करीब आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में भारत और रूस व चीन जैसे प्रमुख देशों की बढ़ती आर्थिक-सामरिक भूमिका अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभाव के लिए जहाँ नई चुनौती पेश कर रही है।वहीं

सबसे बड़ा सवाल डॉलर के दबदबे का है। BRICS देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और सीमा-पार भुगतान को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। BRICS Pay जैसी पहल डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। हालांकि रूस ने हाल में साफ किया है कि उसका लक्ष्य तत्काल “डॉलर-विहीन व्यवस्था” बनाना नहीं है।

आर्थिक जगत से संबंधित लोग कहते है कि क्या BRICS, G7 को पीछे छोड़ देगा? फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि दुनिया अब एकध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। भारत का संदेश भी स्पष्ट है—नया वैश्विक व्यापार टकराव से नहीं, समान अवसर और सहयोग से चलेगा।

इस विषय पर अंतर्राष्ट्रीय मामलो के जानकारों का कहना है कि ब्रिक्स की असली परीक्षा अब घोषणाओं की नहीं, बल्कि व्यापार, भुगतान और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के नियम बदलने की क्षमता की है।

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