बैंक के खजाने तक नकली नोट कैसे पहुंचे? मेरठ की घटना ने बैंक व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल
उत्तरप्रदेश के मेरठ में बैंक करेंसी में करीब चार लाख रुपये की राशि में नकली नोट मिलने की घटना ने बैंकिंग व्यवस्था की निगरानी और आंतरिक नियंत्रण प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस प्रकार की घटना और कई राज्यों के बैंको मे भी सुनने को मिली है लेकिन यह मामला केवल नकली नोट मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसे नोट बैंक की करेंसी चेस्ट या शाखा स्तर तक आखिर पहुंचे कैसे?
देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर बैंकों में नकली नोट मिलने के मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में बैंकिंग प्रणाली की उस पूरी प्रक्रिया की जांच जरूरी हो जाती है, जिसके तहत नकदी शाखाओं और करेंसी चेस्ट तक पहुंचती है, उसकी गिनती होती है और नोटों की प्रामाणिकता की जांच की जाती है।

सबसे अहम सवाल यह है कि यदि नकली नोट सामान्य जांच प्रक्रिया को पार कर बैंक के भीतर पहुंच गए, तो किस स्तर पर निगरानी में चूक हुई? क्या यह केवल मशीनों और प्रक्रियाओं की खामी है या कहीं मानवीय मिलीभगत की संभावना भी जांच के दायरे में आनी चाहिए? बिना जांच के किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन वरिष्ठ स्तर की जवाबदेही की पड़ताल से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
लोगो का कहना है कि यदि किसी बैंकिंग तंत्र में नकली मुद्रा, भ्रष्टाचार या संगठित आर्थिक गतिविधियों के लिए रास्ता बनता है, तो उसका असर केवल एक बैंक या शाखा तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे वित्तीय तंत्र में जनता के भरोसे को प्रभावित करता है।

मेरठ की घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसकी निष्पक्ष जांच यह स्पष्ट करे कि नकली नोट बैंक तक किस चरण में पहुंचे, जांच में कहां चूक हुई और जिम्मेदारी किसकी बनती है। बैंकिंग व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए इन सवालों के ठोस जवाब जरूरी हैं।





