ओवैसी की डेडलाइन से यूपी की सियासत में गर्मी-, मुस्लिम वोटों पर बढ़ी खींचतान
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बयान ने विपक्षी खेमे में राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को 2 अक्टूबर तक गठबंधन पर स्थिति स्पष्ट करने का संदेश दिया है। उन्होंने कहा है कि इसके बाद AIMIM अपने गठबंधन का ऐलान करेगी। वहीं दूसरी ओर अखिलेश यादव ने मौजूदा गठबंधन व्यवस्था जारी रहने की बात कही है।
पता हो उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी करीब 19.3 प्रतिशत थी। यह आंकड़ा जनगणना-2011 का है और वर्तमान मतदाता हिस्सेदारी इससे अलग हो सकती है।

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव मे अगर AIMIM अलग चुनाव लड़ती है तो उसका सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव उन विधानसभा क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक है और मुकाबला करीबी रहता है। ऐसी सीटों पर AIMIM को मिलने वाले वोट सपा-कांग्रेस के उम्मीदवारों के वोट में संभावित बंटवारा कर सकते हैं। इसका असर सीट-दर-सीट अलग हो सकता है;लेकिन इसे निश्चित चुनावी नुकसान के रूप में नहीं देखा जा सकता।
राजनैतिक गणितबाजो के अनुसार सपा के लिए चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अखिलेश यादव की ‘PDA’ रणनीति में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों को साथ लाने पर जोर है।वहीं कांग्रेस भी विपक्षी गठबंधन के माध्यम से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

कहा जाता है कि भाजपा के लिए विपक्षी मतों का बंटवारा कुछ सीटों पर चुनावी गणित बदल सकता है। हालांकि AIMIM के अकेले लड़ने से भाजपा को कितनी सीटों पर लाभ होगा, यह उसके उम्मीदवारों की ताकत, स्थानीय समीकरण, BSP की भूमिका, कांग्रेस-सपा के तालमेल और प्रत्येक सीट पर वोटों के अंतर पर निर्भर करेगा। इसलिए अभी इसे संभावित प्रभाव के रूप में देखना अधिक उचित है, निश्चित परिणाम के रूप में नहीं।





