करम की डाली में आस्था, जाईं की हरियाली में समृद्धि की आस; मांदर की थाप पर जीवंत होती जनजातीय संस्कृति करमा
छत्तीसगढ़ – रात का सन्नाटा… आंगन में सजी करम की हरी डाली… टिमटिमाते दीपक और मांदर की गूंजती थाप। जैसे ही करम देवता की विधिवत पूजा-अर्चना पूरी होती है, पूरा गांव लोकगीतों और नृत्य की लय में झूम उठता है। प्रकृति, कृषि, आस्था और सामाजिक एकता का अद्भुत संगम कर्मा पर्व सरगुजा संभाग के जनजातीय अंचल में लोकजीवन की जीवंत धड़कन बनकर सामने आता है।
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी से जुड़ा यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के सनातन संबंध का उत्सव है। करम वृक्ष की डाली को करम देवता का प्रतीक मानकर गांव के प्रमुख अथवा पटेल के आंगन में स्थापित किया जाता है। विधि-विधान से पूजा कर अच्छी वर्षा, भरपूर फसल, परिवार की सुख-समृद्धि और गांव के कल्याण की कामना की जाती है।

कर्मा पर्व की तैयारियों में ‘जाईं’ का विशेष महत्व है। तीजा के अवसर पर जौ, गेहूं, मक्का, धान सहित विभिन्न फसलों के बीज बोए जाते हैं। कुछ दिनों में अंकुरित होकर यही जाईं हरियाली का रूप लेती है। पूजा स्थल पर सजाई गई यह हरियाली धरती की उर्वरता और आने वाली फसल की मंगलकामना का प्रतीक मानी जाती है।


पूजन के दौरान बैगा द्वारा करम राजा की कथा सुनाई जाती है। अक्षत हाथों में लिए ग्रामीण श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण करते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक विश्वास को जीवित नहीं रखती, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक लोकस्मृतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाती है।
पूजा के बाद मांदर, झांझ और मोहरी की धुन पर करमा नृत्य शुरू होता है। महिलाएं और पुरुष सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं। गीतों में खेत-खलिहान, जंगल, प्रेम, रिश्ते और जीवन के अनुभव मुखर होते हैं। यहां नृत्य मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक एकता की अभिव्यक्ति बन जाता है।
सरगुजा और एमसीबी कोरिया के वनांचलों में कर्मा पर्व इस संदेश को भी जीवंत करता है कि मनुष्य का सुख प्रकृति के सुख से जुड़ा है। करम की डाली प्रकृति के प्रति श्रद्धा, जाईं कृषि के प्रति आस्था और मांदर की थाप सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर उभरती है।
बदलते समय, आधुनिक जीवनशैली और तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बावजूद कर्मा पर्व की परंपरा आज भी जनजातीय व अन्य समाज की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से थामे हुए है। सचमुच, जब तक करम की डाली हरी रहेगी और मांदर की थाप रात के सन्नाटे को चीरती रहेगी, तब तक कर्मा केवल पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की जनजातीय लोकसंस्कृति की जीवंत धड़कन बना रहेगा।





