राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा की अनूठी परंपराओं और जनजातीय संस्कृति की सराहना की बस्तर
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जगदलपुर में आयोजित विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में शामिल हुईं। उन्होंने माँ दंतेश्वरी को नमन करते हुए बस्तर दशहरा को छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सामूहिक आस्था, सामाजिक समरसता और जनजातीय परंपराओं का जीवंत प्रतीक बताया।
राष्ट्रपति ने कहा कि लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह अनूठा उत्सव विभिन्न समुदायों को एक सूत्र में जोड़ता है। रथ निर्माण, धार्मिक अनुष्ठानों और सामूहिक सहभागिता की परंपराएं सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्होंने मुरिया दरबार को जनभागीदारी और लोकतांत्रिक संवाद की सशक्त परंपरा बताते हुए कहा कि सामूहिक विचार-विमर्श से जनसमस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त होता है।


श्रीमती मुर्मु ने जनजातीय युवाओं की प्रतिभा को प्रोत्साहित करने, बस्तर की कला-संस्कृति के संरक्षण तथा प्रकृति और वनों की रक्षा पर विशेष बल दिया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जनजातीय समाज की सक्रिय भागीदारी से विकसित भारत-2047 का संकल्प साकार होगा।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए कहा कि माओवाद से मुक्त बस्तर अब नवनिर्माण और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने सड़क, रेल, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में हो रहे कार्यों की जानकारी दी।
इस अवसर पर परंपरागत जनजातीय प्रतिनिधियों के सम्मान में मांझियों का मासिक मानदेय 2,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये तथा चालकी का मानदेय 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये किए जाने की जानकारी दी गई। राष्ट्रपति ने बस्तरवासियों की सुख-समृद्धि और छत्तीसगढ़ की निरंतर प्रगति की कामना की।





