छत्तीसगढ़ 2028 की बिसात- 27 महीने पहले ही आमने-सामने भाजपा-कांग्रेस- स्मृति ईरानी और सुखदेव भगत के सामने संगठन से बूथ तक अग्निपरीक्षा

छत्तीसगढ़ मे भाजपा ने स्मृति ईरानी को मैदान में उतारकर संगठन में धार लाने की कोशिश की, कांग्रेस ने सुखदेव भगत को कमान देकर नई रणनीति का संकेत दिया—लेकिन 2028 की लड़ाई सिर्फ चेहरों की नहीं, जमीनी संगठन, सरकार के कामकाज और कार्यकर्ताओं के भरोसे की होगी।

वैसे छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव भले अभी करीब 27 महीने दूर हों, लेकिन सियासी तापमान बढ़ना शुरू हो गया है। भारत के राजनीतिक नक्शे पर अपेक्षाकृत नया राज्य छत्तीसगढ़ अब 2028 की विधानसभा जंग के लिए धीरे-धीरे चुनावी मोड में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। भाजपा और कांग्रेस ने प्रदेश संगठन की कमान में बदलाव कर साफ संकेत दिया है कि अगली विधानसभा की लड़ाई को केवल चुनावी मौसम तक सीमित नहीं रखा जाएगा। बूथ, संगठन, कार्यकर्ता और स्थानीय मुद्दे अब दोनों दलों की रणनीति के केंद्र में रहने वाले हैं।

भाजपा ने राष्ट्रीय महामंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ की राजनीतिक जिम्मेदारी देकर संगठन को सक्रिय करने की कोशिश की है। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का नहीं, बल्कि सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने का भी है। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 90 में से 54 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, जबकि कांग्रेस को 35 सीटें मिली थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने राज्य की 11 सीटों मे 10 सीटें जीतकर अपनी मजबूत चुनावी स्थिति दिखाई।तो कांग्रेस मात्र कोरबा लोकसभा ही जीत पाई थी जिसे भी कांग्रेस की नहीं बल्कि डाक्टर चरणदास महंत परिवार की जीत कहा जा रहा था ऐसे में स्मृति ईरानी के सामने 2028 में सत्ता को बनाए रखने की चुनौती जहाँ होगी—वहीं विधानसभा चुनाव के बाद पैदा होने वाली संभावित एंटी-इनकम्बेंसी, स्थानीय नाराजगी और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा व सक्रियता जैसे सवाल अहम होंगे।

छत्तीसगढ़ मे स्मार्ट मीटर, राशन वितरण, रोजगार, महंगाई, किसानों से जुड़े सवाल और नागरिक सुविधाएं विपक्ष के संभावित मुद्दों में शामिल हो सकते हैं। वहीं भाजपा के लिए सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को बूथ स्तर तक पहुंचाना महत्वपूर्ण होगा। संगठन में कार्यकर्ताओं की भूमिका और उनकी शिकायतों का समाधान भी 2028 की तैयारी का अहम हिस्सा बनेगा।

दूसरी तरफ कांग्रेस ने सुखदेव भगत को प्रदेश प्रभारी बनाकर संगठन को पुनर्गठित करने की चुनौती सौपी है। 2023 में सत्ता गंवाने और 2024 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 10 सीटें भाजपा के हाथों जाने के बाद कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी जरूरत जमीनी संगठन को फिर से सक्रिय करने की है।प्रमुख नेताओं मे गुटबाजी, नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं और कार्यकर्ताओं में पैदा हुई निराशा को साधे बिना कांग्रेस के लिए 2028 की लड़ाई आसान नहीं होगी।

अब असली मुकाबला इस बात का है कि कौन-सा दल अपने राजनीतिक संदेश को बूथ तक पहुंचा पाता है, कौन कार्यकर्ताओं को चुनावी मशीनरी में बदल पाता है और कौन जनता से जुड़े मुद्दों को लगातार राजनीतिक एजेंडा बनाए रखता है। स्मृति ईरानी और सुखदेव भगत के लिए 2028 की परीक्षा चुनाव के दिन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ प्रवेश करते ही शुरू होने वाली है।

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