धर्मांतरण और आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा प्रहार: अब सियासत, विदेशी फंडिंग और सरकारी चुप्पी पर भी उठेंगे सवाल
नई दिल्ली- धर्मांतरण के बाद पुराने सामाजिक वर्ग के आधार पर आरक्षण का दावा करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मद्रास हाई कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा है। 15 अक्टूबर 2026 के फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से इस्लाम में धर्मांतरण करने मात्र से व्यक्ति को पिछड़ा वर्ग-मुस्लिम श्रेणी में आरक्षण का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज कर दी।
यह निर्णय केवल आरक्षण का प्रश्न नहीं, बल्कि धर्मांतरण के पीछे की मंशा, आर्थिक मजबूरियों के कथित इस्तेमाल और सरकारी निगरानी की प्रभावशीलता पर भी गंभीर बहस खड़ी करता है। यदि किसी व्यक्ति को गरीबी, शिक्षा, नौकरी या आर्थिक सहायता का लालच देकर धर्म बदलने के लिए प्रेरित किया जाता है, तो ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

विदेशी फंडिंग पर सवाल, सबूत भी जरूरी-
आजादी के बाद से धर्मांतरण को लेकर विवाद समय-समय पर उठते रहे हैं। विदेशी धन का इस्तेमाल यदि धार्मिक गतिविधियों की आड़ में अवैध प्रलोभन, दबाव या संगठित धर्मांतरण के लिए होता है, तो उसकी वित्तीय जांच और कड़ी कानूनी कार्रवाई जरूरी है। मगर विदेशी फंडिंग से जुड़े आरोपों को प्रमाणित करने के लिए बैंकिंग रिकॉर्ड, वित्तीय दस्तावेज और जांच एजेंसियों के निष्कर्ष भी आवश्यक हैं।
भाजपा-कांग्रेस, दोनों से जवाबदेही की मांग-
इस विषय मे भाजपा धर्मांतरण के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की बात करती है, लेकिन उसे बताना होगा कि अवैध गतिविधियों की रोकथाम, पीड़ितों की सुरक्षा और वित्तीय निगरानी कितनी प्रभावी रही है। वहीं कांग्रेस को भी स्पष्ट करना चाहिए कि धार्मिक स्वतंत्रता और कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के साथ अवैध प्रलोभन रोकने के लिए उसका व्यावहारिक रुख क्या है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने फैसले का स्वागत किया है। अब सवाल है कि राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर सरकारें पारदर्शी जांच और प्रभावी कार्रवाई कब सुनिश्चित करेंगी?
सामाजिक संगठनों का कहना है कि धर्म की स्वतंत्रता संविधान का अधिकार है, लेकिन धोखे और दबाव से धर्मांतरण कराना स्वीकार्य नहीं। कानून का निष्पक्ष पालन ही इस विवाद का वास्तविक समाधान है।





