मौत के बाद ही क्यों जागता है MP – CG प्रशासन -जहरीली शराब पर पहले क्यों नहीं टूटा शिकंजा? मंत्रियों से अधिकारियो के क्यों होते है दामन दागदार

मध्यप्रदेश मे सागर जिले के बंडा-शाहगढ़ क्षेत्र में संदिग्ध जहरीली शराब से हुई मौतों ने एक बार फिर मध्यप्रदेश की आबकारी व्यवस्था, पुलिस तंत्र और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मौतों का आंकड़ा बढ़ने के साथ सरकार ने अधिकारियों-कर्मचारियों के निलंबन, तबादले और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई शुरू कर दी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर व्यवस्था इतनी ही सक्रिय थी तो जहरीली शराब का कारोबार मौतों से पहले क्यों नहीं दिखाई दिया?

इस घटना मे बड़ी मौतो के बाद कई आबकारी व अन्य अधिकारियों पर कार्रवाई हुई और पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों को भी हटाया गया। यह कार्रवाई जरूरी है, लेकिन सवाल कार्रवाई के समय और उसकी प्रकृति पर है। क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल हादसे के बाद दोषी खोजने तक सीमित है, या अवैध शराब के नेटवर्क को पहले ही रोकना उसकी मूल जिम्मेदारी है?

वैसे मध्यप्रदेश ही नहीं, पड़ोसी छत्तीसगढ़ में भी अवैध शराब के कारोबार को लेकर समय-समय पर पुलिस और आबकारी तंत्र की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह जांच का विषय होना चाहिए कि अवैध शराब का नेटवर्क आखिर स्थानीय स्तर पर इतनी आसानी से कैसे चलता है और उसे संरक्षण कौन देता है। मंत्रियो व जनप्रतिनिधियों तथा अधिकारियों की संलिप्तता के आरोप पर शासन मौन क्यों हो जाता है यदि गंभीर आरोप सामने आते हैं तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होती है जिसका कारण शराब मार्फीया का सत्ता व प्रशासन के करीब भी बताया जाता है

मध्यप्रदेश सागर के बंडा की त्रासदी ने एक कड़वा सच सामने रखा है जिसमे लगने वाला आरोप अब सही जान पड़ने लगा कि —सरकारी मशीनरी अक्सर तब हरकत में आती है, जब कई परिवार उजड़ चुके होते हैं। जिसमे निलंबन और तबादले सुर्खियां तो बना सकते हैं, लेकिन असली जवाबदेही तब होगी जब यह पता चले कि जहरीली शराब बाजार तक पहुंची कैसे, शिकायतों पर पहले क्या कार्रवाई हुई और निगरानी तंत्र कहां विफल हुआ।

जिससे खरी खरी कहने मे अब संकोच नहीं होनी चाहिए कि जनता को अब दिखावटी सख्ती नहीं, बल्कि मौतों से पहले कार्रवाई और दोषियों की जवाबदेही चाहिए।

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