SIR पर कांग्रेस को अपने ही मंत्री ने घेरा! एक करोड़ नाम कटने को बताया सही, अब राहुल गांधी की मुहिम पर उठे सवाल
कर्नाटक में सतीश जारकीहोली के बयान से कांग्रेस के भीतर सियासी टकराव, प्रियंक खड़गे और बीके हरिप्रसाद ने उठाए सवाल; 1 नवंबर की दिल्ली रैली से पहले पार्टी की मुश्किलें बढ़ीं।
नई दिल्ली – कांग्रेस जिस SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रही है, उसी मुद्दे पर अब उसके अपने नेताओं के अलग-अलग सुर पार्टी के लिए नई चुनौती बन गए हैं। कर्नाटक में करीब एक करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से कम होने के बाद वरिष्ठ मंत्री सतीश जारकीहोली ने प्रक्रिया को सही ठहराकर ऐसा बयान दिया है, जिसने कांग्रेस के राष्ट्रीय अभियान की धार पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जारकीहोली बोले—कर्नाटक में SIR सही हुआ-

खबरों के अनुसार कर्नाटक के लोक निर्माण मंत्री सतीश जारकीहोली ने कहा है कि राज्य में SIR की प्रक्रिया ठीक तरीके से पूरी हुई। उनका तर्क था कि कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया और सतर्कता बरती, इसलिए यहां प्रक्रिया में गड़बड़ी नहीं हुई। उन्होंने दावा किया कि हटाए गए नाम मृत, दूसरी जगह जा चुके या मतदाता सूची में दोहरी प्रविष्टि वाले लोगों के थे। उनका कहना था कि बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में भी इसी तरह प्रक्रिया होनी चाहिए थी।
लेकिन सवाल यह है कि जब कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, तब उसकी अपनी सरकार का मंत्री इसे सही कैसे बता रहा है?
प्रियंक खड़गे और हरिप्रसाद ने उठाए सवाल-
बताया जाता है कि जारकीहोली के बयान के बाद कर्नाटक के मंत्री प्रियंक खड़गे ने असहमति जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 के थोक में इस्तेमाल और जीवित लोगों को मृत बताने जैसी शिकायतें सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि इन मामलों की तह तक जाना जरूरी है।
वहीं, कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद ने भी अनुपस्थित दर्ज किए गए मतदाताओं के नाम हटाने पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि मृत और दोहरे नाम हटाने पर आपत्ति नहीं, लेकिन पात्र मतदाताओं के नाम सूची से क्यों गायब हुए, इसका जवाब मिलना चाहिए।
क्या कमजोर पड़ेगी राहुल गांधी की SIR विरोधी मुहिम?
कर्नाटक की अंतिम मतदाता सूची में पहले के 5.54 करोड़ मतदाताओं की तुलना में अब लगभग 4.55 करोड़ नाम दर्ज हैं। यानी करीब 99.32 लाख नाम कम हुए हैं। यह संख्या अपने आप में बड़ी है, लेकिन केवल नामों की कटौती से यह साबित नहीं होता कि सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए या सभी कटौतियां उचित थीं। असली सवाल पात्र मतदाताओं के अधिकारों और प्रक्रिया की पारदर्शिता का है।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह दूसरे राज्यों में SIR पर सवाल उठाते हुए कर्नाटक की प्रक्रिया को लेकर एक स्पष्ट रुख कैसे पेश करती है। एक तरफ जारकीहोली का समर्थन है, दूसरी ओर प्रियंक खड़गे और हरिप्रसाद की आपत्तियां।
1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित विपक्षी रैली से पहले यह मतभेद कांग्रेस को राजनीतिक रूप से असहज कर सकता है। भाजपा को भी कांग्रेस पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाने का मौका इससे मिल गया है।
अब कांग्रेस की असली परीक्षा यह होगी कि वह अपने नेताओं के विरोधाभासी बयानों के बीच एक स्पष्ट संदेश दे पाती है या नहीं। SIR के खिलाफ उसका आंदोलन जारी रह सकता है, लेकिन उसकी राजनीतिक धार इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कथित अनियमितताओं के ठोस प्रमाण, पात्र मतदाताओं के नाम बहाल कराने की मांग और कर्नाटक में अपने ही नेताओं के अलग-अलग बयानों का जवाब कितनी मजबूती से देती है।





