सड़क सुरक्षा का नया न्याय मॉडल: ड्रंक एंड ड्राइव पर सिर्फ चालान नहीं, 30 दिन सामुदायिक सेवा

जांजगीर-चांपा CJM कोर्ट का अनोखा फैसला, 15 हजार रुपये जुर्माने के साथ 90 घंटे सेवा का आदेश

जांजगीर-चांपा। शराब के नशे में वाहन चलाना अब केवल जेब पर भारी पड़ने वाला अपराध नहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) न्यायालय ने ड्रंक एंड ड्राइव के एक मामले में आर्थिक दंड के साथ सामुदायिक सेवा का आदेश देकर सड़क सुरक्षा को लेकर कड़ा सामाजिक संदेश दिया है।

न्यायालय ने आरोपी पर 15 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही उसे 30 दिनों तक प्रतिदिन तीन घंटे सामुदायिक सेवा करने का आदेश दिया गया है। आदेश के तहत आरोपी को यातायात शाखा और कोतवाली थाना परिसर में सफाई कार्य करना होगा। इस तरह 30 दिनों में कुल 90 घंटे सामुदायिक सेवा करनी होगी।

दोबारा नशे में वाहन चलाना पड़ा भारी

मामला जांजगीर-चांपा जिले के सरखों गांव से जुड़ा बताया जा रहा है। यातायात पुलिस ने आरोपी को शराब के नशे में वाहन चलाते हुए पकड़ा था। वाहन जब्त करने के बाद पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर आरोपी को न्यायालय के समक्ष पेश किया।

सुनवाई के दौरान सामने आया कि आरोपी इससे पहले भी नशे में वाहन चलाने के मामले में पकड़ा जा चुका था और उस समय उस पर आर्थिक दंड लगाया गया था। दोबारा इसी तरह का अपराध सामने आने पर न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए जुर्माने के साथ सामुदायिक सेवा का आदेश दिया।

सिर्फ जुर्माना या सुधार का रास्ता?

ड्रंक एंड ड्राइव सड़क सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। तेज रफ्तार के साथ शराब के नशे में वाहन चलाना चालक के साथ-साथ सड़क पर चल रहे दूसरे लोगों की जान के लिए भी खतरा पैदा करता है।

ऐसे मामलों में केवल आर्थिक दंड देने के बजाय आरोपी को समाजोपयोगी कार्य से जोड़ने की अवधारणा को सुधारात्मक न्याय के नजरिए से देखा जा रहा है। जांजगीर-चांपा न्यायालय का यह आदेश इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है।

सामुदायिक सेवा से समाज को संदेश

सड़क सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि जुर्माना भरने के बाद कई आरोपी अपनी गलती को गंभीरता से नहीं लेते। इसके विपरीत सामुदायिक सेवा के दौरान उन्हें अपनी गलती के सामाजिक प्रभाव को समझने का अवसर मिल सकता है।

थाना और यातायात शाखा परिसर में सफाई जैसे कार्य से यह संदेश भी जाता है कि सड़क पर लापरवाही केवल व्यक्ति की निजी गलती नहीं, बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

देश में सड़क सुरक्षा पर बढ़ती चिंता

भारत में सड़क दुर्घटनाओं में हर वर्ष बड़ी संख्या में लोगों की जान जाती है। शराब पीकर वाहन चलाना दुर्घटनाओं के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल है। ऐसे में कानून के साथ-साथ लोगों के व्यवहार में बदलाव लाना भी सड़क सुरक्षा के लिए जरूरी माना जाता है।

मोटर वाहन कानून के तहत शराब के नशे में वाहन चलाने पर दंड का प्रावधान है। वहीं भारतीय न्याय व्यवस्था में सामुदायिक सेवा को सुधारात्मक दंड के रूप में भी महत्व मिला है। हालांकि किसी विशेष मामले में सामुदायिक सेवा किस कानूनी प्रावधान के तहत दी गई है, यह संबंधित न्यायालय के आदेश की सटीक भाषा से ही स्पष्ट होगा।

क्या देशभर में लागू हो सकता है ऐसा मॉडल?

जांजगीर-चांपा के इस फैसले ने एक अहम बहस को जन्म दिया है—क्या ड्रंक एंड ड्राइव जैसे अपराधों में जुर्माने और अन्य कानूनी कार्रवाई के साथ सामुदायिक सेवा को भी प्रभावी सुधारात्मक उपाय बनाया जा सकता है?

यदि सामुदायिक सेवा का उद्देश्य आरोपी को अपनी गलती का एहसास कराना और समाज को सड़क सुरक्षा का संदेश देना है, तो ऐसे फैसले लोगों में कानून के प्रति जिम्मेदारी और सड़क पर सावधानी की भावना मजबूत कर सकते हैं।

जांजगीर-चांपा CJM न्यायालय का यह फैसला फिलहाल इसी वजह से चर्चा में है। सड़क पर एक व्यक्ति की लापरवाही दूसरे व्यक्ति की जिंदगी पर भारी पड़ सकती है। इसलिए ड्रंक एंड ड्राइव के खिलाफ कानून का डर ही नहीं, जिम्मेदारी का एहसास भी जरूरी है।

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