बुजुर्ग होता जापान: घटती जन्मदर युवा पीढ़ी की कमी से अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था पर बढ़ रहा दबाव

दुनिया के सबसे तेजी से बुजुर्ग होती आबादी वाले देशों में शामिल जापान के सामने जनसांख्यिकीय संकट लगातार गहराता जा रहा है। घटती जन्मदर और बढ़ती जीवन प्रत्याशा ने देश की आबादी का संतुलन बदल दिया है। बच्चों और युवाओं की संख्या घट रही है, जबकि बुजुर्गों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि जापान को अक्सर दुनिया के सबसे वृद्ध समाजों में गिना जाता है।

जापान में जन्मदर की स्थिति कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2024 में देश में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या 6.86 लाख रही, जो उपलब्ध रिकॉर्ड में सबसे कम थी। 2025 में भी जन्मों की संख्या करीब 7.06 लाख रह गई और लगातार दसवें वर्ष नया निचला स्तर दर्ज हुआ।

इसी गंभीर परिस्थिति के बीच जापानी लेखिका और पूर्व राजनीतिक उम्मीदवार कोटोए हाशिमोटो द्वारा अपने सातवें बच्चे के जन्म की घोषणा चर्चा का विषय बन गई है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने इसे जापान की घटती जन्मदर की समस्या से जोड़ते हुए अधिक जापानी महिलाओं को परिवार बढ़ाने के लिए प्रेरित करने की इच्छा जताई है।

लेकिन जापान की समस्या केवल बच्चों की कम होती संख्या तक सीमित नहीं है। कामकाजी उम्र की आबादी घटने से उद्योगों को श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और बुजुर्गों की देखभाल पर सरकारी खर्च बढ़ रहा है। दूसरी ओर, युवाओं पर वृद्ध आबादी की सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारी का बोझ बढ़ता जा रहा है।

जापान के सामने चुनौती यह है कि केवल लोगों से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील से संकट का समाधान नहीं होगा। महंगाई, बच्चों की परवरिश का खर्च, काम और परिवार के बीच संतुलन तथा महिलाओं के रोजगार से जुड़े सवाल भी जन्मदर को प्रभावित करते हैं।

हाशिमोटो की कहानी भले ही प्रतीकात्मक उम्मीद जगाती हो, लेकिन जापान की घटती आबादी को थामने के लिए परिवार समर्थक नीतियों, बेहतर रोजगार व्यवस्था और युवाओं के लिए सुरक्षित आर्थिक भविष्य की जरूरत होगी। जापान का अनुभव उन देशों के लिए भी चेतावनी है जहां जन्मदर लगातार नीचे जा रही है।

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