आंदोलन के नाम पर कब्जे की मनमानी नहीं चलेगी! सुप्रीम कोर्ट का दो टूक संदेश—प्रदर्शनकारियों के अधिकार हैं, लेकिन व्यापारियों की रोजी-रोटी भी संविधान की गारंटी

नई दिल्ली – आंदोलन के नाम पर सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा जमाकर आम जनता, व्यापारियों और रोजी-रोटी कमाने वाले लोगों को परेशान करने की प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के कारण व्यापार प्रभावित होने की शिकायतों पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी संगठन, राजनीतिक दल या आंदोलनकारी समूह किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं कर सकता। अदालत ने व्यापारियों की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब भी मांगा है।

आंदोलन के नाम पर जनता को बंधक बनाना लोकतंत्र नहीं!

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने उन संगठनों के लिए गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो अपनी मांगों के नाम पर सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करना ही आंदोलन की सफलता मान बैठते हैं। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन क्या इस अधिकार की आड़ में दूसरे नागरिकों के अधिकारों को कुचलने की छूट भी मिल सकती है? अदालत का संदेश साफ है—एक समूह यह नहीं कह सकता कि वह प्रदर्शन कर रहा है, इसलिए दूसरे लोग वहां प्रदर्शन नहीं कर सकते।

व्यापारियों की परेशानी भी आखिर किसकी जिम्मेदारी?

दिल्ली में प्रदर्शन और बंद के आह्वान से व्यापारियों ने भारी आर्थिक नुकसान की शिकायत की। बाजारों में कारोबार प्रभावित होने से केवल दुकानदार ही नहीं, बल्कि छोटे कर्मचारी, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, परिवहन कारोबारी और रोज कमाकर खाने वाले परिवार भी प्रभावित होते हैं। त्योहारों के समय कारोबार ठप होना अनेक परिवारों की आर्थिक कमर तोड़ सकता है। अदालत ने भी व्यापार, व्यवसाय और आजीविका के अधिकार को आंदोलन के अधिकार के साथ संतुलित करने की आवश्यकता बताई।

संविधान अधिकार देता है, अराजकता की अनुमति नहीं!

आंदोलनकारी यदि जनहित, देशहित और अपनी मांगों के प्रति वास्तव में गंभीर हैं, तो उन्हें यह भी समझना होगा कि उनकी गतिविधियों से आम नागरिकों को कितनी परेशानी हो रही है। सड़कें बाधित करना, बाजार बंद करवाना, सार्वजनिक स्थलों पर लंबे समय तक कब्जा जमाना और बिना अनुमति मार्च निकालना किसी भी जिम्मेदार लोकतांत्रिक व्यवस्था का आदर्श नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदर्शन स्थलों का उपयोग निर्धारित अवधि के लिए होना चाहिए, ताकि किसान, मजदूर, पत्रकार, व्यापारी और अन्य संगठन भी अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें।

अब जवाबदेही भी तय होनी चाहिए!

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सार यही है—लोकतंत्र में आंदोलन का अधिकार है, लेकिन किसी दूसरे की रोजी-रोटी छीनने का अधिकार नहीं। सार्वजनिक स्थल किसी संगठन की निजी संपत्ति नहीं हैं। आंदोलन जनहित के लिए होना चाहिए, जनजीवन को ठप करने के लिए नहीं।

About The Author

इन्हें भी पढ़े