भाजपा में वरिष्ठों की अनदेखी या नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की रणनीति? अजय चंद्राकर के तेवर ने फिर छेड़ी सियासी बहस
मंच से दूरी, सत्ता में सीमित हिस्सेदारी और संगठन में जिम्मेदारियों का सवाल… क्या छत्तीसगढ़ भाजपा में पुराने दिग्गजों और नई पीढ़ी के बीच बढ़ रही है सियासी खाई?
छत्तीसगढ़ – भाजपा में सब कुछ ठीक है तो फिर वरिष्ठ नेताओं के राजनीतिक कद और उनकी भूमिका को लेकर बार-बार सवाल क्यों उठ रहे हैं? धमतरी में भाजपा के कार्यक्रम के दौरान कुरूद विधायक एवं पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर का मंच पर नहीं जाना अब पार्टी के भीतर वरिष्ठ नेताओं की स्थिति को लेकर नई बहस का विषय बन गया है।
आयोजित कार्यक्रम में चंद्राकर मुख्य वक्ता थे। उन्हें मंच पर आमंत्रित किया गया, लेकिन वे कार्यकर्ताओं के बीच नीचे बैठे रहे। मंत्री टंकराम वर्मा ने भी हाथ जोड़कर उन्हें मंच पर आने का आग्रह किया, लेकिन वे नहीं उठे। हालांकि, मीडिया से बातचीत में दोनों नेताओं ने नाराजगी की बात से इनकार किया। चंद्राकर ने दिवंगत अहिवारा विधायक डोमनलाल कोरसेवाड़ा के निधन के बीच स्वागत-सत्कार के आयोजन पर आपत्ति जताई थी। इसलिए इस घटनाक्रम को सीधे मंत्री पद की नाराजगी मान लेना जल्दबाजी होगी।

लेकिन बड़ा सवाल इससे आगे का है। 2023 में सत्ता में वापसी के बाद भाजपा ने पुराने के अपेक्षाकृत नए चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपीं। जिससे अजय चंद्राकर, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, बृजमोहन अग्रवाल और लता उसेंडी जैसे अनुभवी नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली।
संगठन में अमर अग्रवाल और लता उसेंडी जैसे नेताओं को जिम्मेदारियां जरूर मिली हैं, लेकिन क्या यह उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव क्षमता के अनुरूप है? यह चर्चा का विषय है।
भाजपा के सामने चुनौती केवल नए चेहरों को आगे बढ़ाने की नहीं, बल्कि पुराने नेतृत्व के सम्मान, अनुभव और सक्रिय भागीदारी को बनाए रखने की भी है।
सवाल यह है कि क्या नए विधायकों को सत्ता की कमान सौंपने की रणनीति में अनुभवी नेताओं की भूमिका सीमित होती जा रही है? और क्या संगठन इस असंतुलन को समय रहते साध पाएगा?
अजय चंद्राकर का धमतरी वाला घटनाक्रम भले ही स्वागत-सत्कार के विरोध से जुड़ा हो, लेकिन उसने भाजपा के भीतर नेतृत्व, सम्मान और हिस्सेदारी की बहस को फिर सतह पर ला दिया है।





