फिल्म सिटी के नाम पर वृक्षों की बलि क्यों? विकास चाहिए, विनाश नहीं!
रायपुर में फिल्म सिटी निर्माण के लिए पुराने पेड़ों की कटाई पर सवाल, छत्तीसगढ़ शासन के फैसले की पर्यावरण प्रेमियों ने की आलोचना
छत्तीसगढ़ – की राजधानी रायपुर में फिल्म सिटी बनाने के नाम पर यदि वर्षों पुराने वृक्षों को काटना पड़े, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह कैसा विकास है, जिसकी नींव ही प्रकृति के विनाश पर रखी जा रही है? क्या फिल्म सिटी की खूबसूरती पेड़ों को गिराकर ही बढ़ाई जा सकती है, या फिर प्रकृति को बचाकर भी विश्वस्तरीय फिल्म सिटी का निर्माण संभव है?
फिल्म सिटी मनोरंजन, कला, संस्कृति और पर्यटन को बढ़ावा देने वाली परियोजना है। लेकिन इसकी आड़ में हरे-भरे और पुराने वृक्षों को काटना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। पेड़ किसी भी परिसर की बाधा नहीं, बल्कि उसकी प्राकृतिक सुंदरता, शीतलता और पहचान होते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जिस स्थान पर पहले से विशाल वृक्ष मौजूद थे, उसी जगह का चयन करते समय उनके संरक्षण को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई?

क्या योजनाकारों की कल्पनाशीलता इतनी सीमित है कि उन्हें खूबसूरत फिल्मी लोकेशन बनाने के लिए पेड़ों की कटाई ही एकमात्र रास्ता नजर आता है?
दुनिया भर में प्राकृतिक जंगलों, हरियाली, झीलों और पुराने वृक्षों को फिल्मांकन के लिए आकर्षक लोकेशन के रूप में विकसित किया जाता है। छत्तीसगढ़ भी अपनी प्राकृतिक संपदा के दम पर अलग पहचान बना सकता है। पुराने वृक्षों को सुरक्षित रखते हुए उनके आसपास फिल्म सेट, शूटिंग फ्लोर, स्टूडियो, तकनीकी केंद्र और अन्य सुविधाओं की योजना बनाई जा सकती है। जरूरत है तो केवल संवेदनशील नियोजन और इच्छाशक्ति की।
छत्तीसगढ़ शासन को चाहिए कि वह वृक्षों की कटाई से जुड़े निर्णय पर पुनर्विचार करे, वैकल्पिक डिजाइन की समीक्षा कराए और पर्यावरण विशेषज्ञों तथा स्थानीय नागरिकों की राय ले।
छत्तीसगढ़ मे फिल्म सिटी बनाइए, लेकिन पेड़ों की कब्रगाह बनाकर नहीं! विकास वह नहीं जो कंक्रीट के ढांचे खड़े करके हरियाली मिटा दे, बल्कि वह है जो आधुनिकता और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए।
याद रखिए, फिल्म सिटी की चमक कुछ वर्षों में बदल सकती है, लेकिन दशकों में तैयार हुए पुराने वृक्षों की भरपाई आसान नहीं है। छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी हरियाली भी है। उसे बचाना सरकार की जिम्मेदारी और समाज का अधिकार है।





