पंजाब में नशे की बोली और गोलियों की गूंज! आखिर कानून-व्यवस्था पर सरकार कब देगी जवाब?
चंडीगढ़ – जिस पंजाब की पहचान कभी खेती-किसानी, मेहनत और खुशहाली से होती थी, आज उसी पंजाब में नशे और गोलियों की गूंज ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। कहीं सरेआम शूटआउट, कहीं पुरानी रंजिश में हत्या, तो कहीं नशे के कारोबार से जुड़े विवादों में खून बहने की खबरें—आखिर पंजाब किस दिशा में जा रहा है?
तरनतारन, मोगा और अमृतसर से सामने आई हत्याओं की घटनाओं ने कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मोगा में स्कॉर्पियो से आए हमलावरों द्वारा दो लोगों पर गोलियां चलाने और तरनतारन में सरेआम गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत जैसी घटनाएं दहशत का माहौल पैदा करती हैं। वहीं, अमृतसर में सरपंच के बेटे की हत्या ने भी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। सितंबर में नशे से जुड़े विवादों के बीच तीन हत्याओं की बात सामने आने के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या नशा अब पंजाब में हिंसक अपराधों को बढ़ाने वाला एक बड़ा कारक बनता जा रहा है?

सवाल सीधे पंजाब सरकार से है—अगर अपराधी सरेआम गोलियां चला रहे हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? नशे के खिलाफ अभियान, पुलिस कार्रवाई और सरकारी दावों के बावजूद यदि ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, तो उनकी प्रभावशीलता की समीक्षा जरूरी है। हालांकि, हर हत्या के पीछे नशे को कारण मानना सही नहीं होगा; पुलिस जांच और ठोस सबूत ही वास्तविक वजह स्पष्ट कर सकते हैं।
अब राजनीतिक सवाल भी बड़ा है। क्या आगामी चुनावों में नशा, गैंगस्टरवाद और कानून-व्यवस्था प्रमुख मुद्दे बनेंगे? क्या सत्ता पक्ष अपने प्रयासों का ठोस हिसाब देगा और विपक्ष केवल आरोप लगाने के बजाय प्रभावी विकल्प पेश करेगा?
पंजाब को नारों से ज्यादा नतीजों की जरूरत है—नशे की सप्लाई पर सख्त कार्रवाई, युवाओं के पुनर्वास, अपराधियों पर त्वरित कार्रवाई और जवाबदेह पुलिस व्यवस्था की जरूरत है।
क्योंकि पंजाब की पहचान खेतों में लहलहाती फसल से होनी चाहिए, न कि सड़कों पर बहते खून और नशे की गिरफ्त में फंसते युवाओं से। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि गोलियां कौन चला रहा है—सवाल यह भी है कि इस दहशत को रोकने के लिए जवाबदेही कब तय होगी?





