साड़ी पहनकर AK-47 चलाने वाली महिला IPS अंकिता शर्मा के साहस पर सवाल क्यों? नियमों की आड़ में महिला अधिकारी का मनोबल तोड़ने की कोशिश तो नहीं!
राजनांदगांव एसपी अंकिता शर्मा के मामले में निष्पक्ष जांच हो, तो प्रदेश के सभी जिलों में हर्ष फायरिंग और नियमों के पालन की भी हो समान समीक्षा
छत्तीसगढ़ – भारतीय परिधान साड़ी पहनकर AK-47 से हर्ष फायरिंग करने वाली राजनांदगांव की पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा का साहस, आत्मविश्वास और कर्तव्यनिष्ठा चर्चा का विषय बना हुआ है। एक महिला आईपीएस अधिकारी के रूप में उनका व्यक्तित्व महिलाओं के आत्मविश्वास और सशक्तीकरण का संदेश देता है। लेकिन शस्त्र पूजन के अवसर पर हर्ष फायरिंग को लेकर पुलिस मुख्यालय द्वारा संज्ञान लिए जाने और राजनांदगांव रेंज के आईजी द्वारा स्पष्टीकरण मांगे जाने की खबरों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या साड़ी पहनना गुनाह है, महिला अधिकारी होना गुनाह है या फिर परंपरा का निर्वहन करना? सवाल यह नहीं कि नियमों का पालन होना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि नियमों की समीक्षा सभी के लिए समान रूप से होती है या नहीं। यदि हर्ष फायरिंग नियमों के विरुद्ध है, तो प्रदेश के अन्य जिलों में ऐसे मामलों पर भी समान कार्रवाई और जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए।

पुलिस विभाग में शस्त्र पूजन की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। भारतीय संस्कृति में शस्त्रों को शक्ति, सुरक्षा और कर्तव्य का प्रतीक माना जाता है। साड़ी भारतीय नारी की सांस्कृतिक पहचान और गौरवशाली परिधान है। साड़ी पहनकर आधुनिक हथियार चलाने वाली महिला अधिकारी की तस्वीर महिलाओं के आत्मविश्वास और क्षमता को रेखांकित करती है। जिसकी महिला संगठनों ने खुल कर तारीफ कर रही है उनका कहना है कि आधुनिक भारत मे भारतीय परम्परा व परिवेश के साथ आत्मबल से भरपूर सशक्त महिला की छवि व प्रेरणा बन कर अंकिता शर्मा सामने आई है यह अकेले अंकिता शर्मा की नहीं बल्कि उभरते छत्तीसगढ़ व नए भारत की तस्वीर अब अन्य महिलाओं के लिए बन गई है

इस सबंध मे महिला संगठनों का कहना है कि यदि राजनेताओं के आगमन, सार्वजनिक कार्यक्रमों अथवा अन्य अवसरों पर भी हथियारों के प्रदर्शन और हर्ष फायरिंग के मामले मे नियम क्यों शिथिल क्यों पड़ने लगते हैं, वहां भी नियमों के उल्लंघन की निष्पक्ष जांच क्यों होनी चाहिए। इस सबंध मे किसी अधिकारी के महिला होने या भारतीय परिधान पहनने के कारण उसे अलग नजरिये से देखना उचित नहीं है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अंकिता शर्मा के मामले में कार्रवाई की प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष है? यदि अन्य अधिकारियों के मामलों में अलग मानदंड अपनाए गए हैं, तो इसकी जांच होनी चाहिए। बिना प्रमाण किसी साजिश का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं, लेकिन महिला अधिकारी का मनोबल तोड़ने या उन्हें निशाना बनाने की आशंका हो तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
वर्तमान मे अंकिता शर्मा के साहस और आत्मविश्वास की सराहना के साथ यह मांग उठ रही है कि पूरे प्रदेश में एक समान नियम लागू हों, किसी के साथ भेदभाव न हो और परंपरा तथा कानून के बीच संतुलन कायम रखा जाए। नियमों की आड़ में किसी अधिकारी का मनोबल गिराने की आशंका हो, तो उसका सच भी सामने आना चाहिए?





